पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की कई पत्नियाँ क्यों थीं?

इतिहास, फ़िरक़े और आज के मुसलमान क़ुरआन · 2 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ का 25 साल तक, ख़दीजा की वफ़ात तक, केवल एक औरत से विवाह रहा, जब वे लगभग 50 साल के थे। उनके बाद के विवाह, उनकी वफ़ात के बाद, ज़्यादातर विधवाओं से थे और सामाजिक और राजनीतिक कारणों से थे, जैसे उनकी रक्षा करना, गठबंधन बनाना और अपने घराने के ज़रिए समुदाय को सिखाना।

विस्तृत जवाब

उनकी ज़्यादातर पत्नियाँ विधवा या तलाक़शुदा थीं, कुछ बच्चों वाली, और उनमें से बहुत सी उनसे बड़ी थीं। उम्मे सलमा से, जिनके पति की मृत्यु हो गई थी, और ज़ैनब बिन्त ख़ुज़ैमा से, जो 'ग़रीबों की माँ' के नाम से जानी जाती थीं, विवाह ने उन्हें सुरक्षा दी। जुवैरिया और सफ़िय्या से विवाह, जिन्हें क़ैद करके लाया गया था, से उनकी आज़ादी और उनकी क़ौम के बहुत से लोगों की रिहाई हुई। उनकी पत्नियाँ औरतों की शिक्षिकाएँ और उनके आदर्श की रावी भी बनीं, और अकेली आइशा ने दो हज़ार से ज़्यादा हदीसें रिवायत कीं।

क़ुरआन ने उन्हें इस मामले में ख़ास नियम दिए, और बाक़ी समुदाय के लिए चार पत्नियों की सीमा तय की। आलोचक तर्क देते हैं कि यह इच्छा की बात थी, और मुसलमान जवाब देते हैं कि ऐसी इच्छा वाला आदमी 25 साल तक एक बड़ी उम्र की पत्नी के साथ न रहता, और यह कि उनके दुश्मनों ने, जिन्होंने उन पर हर दूसरी चीज़ का इल्ज़ाम लगाया, यह इल्ज़ाम नहीं लगाया।

क़ुरआन से

ٱلنَّبِىُّ أَوْلَىٰ بِٱلْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ ۖ وَأَزْوَٰجُهُۥٓ أُمَّهَٰتُهُمْ ۗ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَىٰ بِبَعْضٍۢ فِى كِتَٰبِ ٱللَّهِ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُهَٰجِرِينَ إِلَّآ أَن تَفْعَلُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَوْلِيَآئِكُم مَّعْرُوفًۭا ۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِى ٱلْكِتَٰبِ مَسْطُورًۭا ﴿٦﴾

नबी तो मोमिनीन से खुद उनकी जानों से भी बढ़कर हक़ रखते हैं (क्योंकि वह गोया उम्मत के मेहरबान बाप हैं) और उनकी बीवियाँ (गोया) उनकी माएँ हैं और मोमिनीन व मुहाजिरीन में से (जो लोग बाहम) क़राबतदार हैं। किताबें खुदा की रूह से (ग़ैरों की निस्बत) एक दूसरे के (तर्के के) ज्यादा हक़दार हैं मगर (जब) तुम अपने दोस्तों के साथ सुलूक करना चाहो (तो दूसरी बात है) ये तो किताबे (खुदा) में लिखा हुआ (मौजूद) है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَٰجَكَ ٱلَّٰتِىٓ ءَاتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّٰتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَٰلَٰتِكَ ٱلَّٰتِى هَاجَرْنَ مَعَكَ وَٱمْرَأَةًۭ مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِىِّ إِنْ أَرَادَ ٱلنَّبِىُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةًۭ لَّكَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِىٓ أَزْوَٰجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌۭ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا ﴿٥٠﴾

ऐ नबी हमने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी उन बीवियों को हलाल कर दिया है जिनको तुम मेहर दे चुके हो और तुम्हारी उन लौंडियों को (भी) जो खुदा ने तुमको (बग़ैर लड़े-भिड़े) माले ग़नीमत में अता की है और तुम्हारे चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामू की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जो तुम्हारे साथ हिजरत करके आयी हैं (हलाल कर दी और हर ईमानवाली औरत (भी हलाल कर दी) अगर वह अपने को (बग़ैर मेहर) नबी को दे दें और नबी भी उससे निकाह करना चाहते हों मगर (ऐ रसूल) ये हुक्म सिर्फ तुम्हारे वास्ते ख़ास है और मोमिनीन के लिए नहीं और हमने जो कुछ (मेहर या क़ीमत) आम मोमिनीन पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर कर दिया है हम खूब जानते हैं और (तुम्हारी रिआयत इसलिए है) ताकि तुमको (बीवियों की तरफ से) कोई दिक्क़त न हो और खुदा तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 3818 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنِي عُمَرُ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ حَسَنٍ، حَدَّثَنَا أَبِي، حَدَّثَنَا حَفْصٌ، عَنْ هِشَامٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ ـ رضى الله عنها ـ قَالَتْ مَا غِرْتُ عَلَى أَحَدٍ مِنْ نِسَاءِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مَا غِرْتُ عَلَى خَدِيجَةَ، وَمَا رَأَيْتُهَا، وَلَكِنْ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يُكْثِرُ ذِكْرَهَا، وَرُبَّمَا ذَبَحَ الشَّاةَ، ثُمَّ يُقَطِّعُهَا أَعْضَاءً، ثُمَّ يَبْعَثُهَا فِي صَدَائِقِ خَدِيجَةَ، فَرُبَّمَا قُلْتُ لَهُ كَأَنَّهُ لَمْ يَكُنْ فِي الدُّنْيَا امْرَأَةٌ إِلاَّ خَدِيجَةُ‏.‏ فَيَقُولُ إِنَّهَا كَانَتْ وَكَانَتْ، وَكَانَ لِي مِنْهَا وَلَدٌ‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 3821 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

وَقَالَ إِسْمَاعِيلُ بْنُ خَلِيلٍ أَخْبَرَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ، عَنْ هِشَامٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ ـ رضى الله عنها ـ قَالَتِ اسْتَأْذَنَتْ هَالَةُ بِنْتُ خُوَيْلِدٍ أُخْتُ خَدِيجَةَ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَعَرَفَ اسْتِئْذَانَ خَدِيجَةَ فَارْتَاعَ لِذَلِكَ، فَقَالَ ‏ "‏ اللَّهُمَّ هَالَةَ ‏"‏‏.‏ قَالَتْ فَغِرْتُ فَقُلْتُ مَا تَذْكُرُ مِنْ عَجُوزٍ مِنْ عَجَائِزِ قُرَيْشٍ، حَمْرَاءِ الشِّدْقَيْنِ، هَلَكَتْ فِي الدَّهْرِ، قَدْ، أَبْدَلَكَ اللَّهُ خَيْرًا مِنْهَا

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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