इस्लाम में फ़रिश्ते कौन हैं?

जीवन, मृत्यु और आख़िरत क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

फ़रिश्ते नूर से बने जीव हैं जो अल्लाह का पूरा हुक्म मानते हैं और नाफ़रमानी नहीं करते। उन्हें गुनाह करने का इख़्तियार नहीं। मुसलमान ईमान के हिस्से के रूप में उन पर ईमान रखते हैं: जैसे जिब्रील वह्य लाए, और फ़रिश्ते हर इंसान के आमाल लिखते हैं।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन जिब्रील का ज़िक्र करता है जो वह्य पहुँचाते हैं, मीकाईल का, जो बारिश और रोज़ी के ज़िम्मेदार हैं, इसराफ़ील का, जो सूर फूँकेंगे, और मौत के फ़रिश्ते का। दो फ़रिश्ते हर इंसान की नेकियाँ और बुराइयाँ लिखते हैं, और फ़रिश्ते अल्लाह के हुक्म से लोगों की हिफ़ाज़त करते हैं।

फ़रिश्तों की इबादत नहीं की जाती और वे अल्लाह की संतान नहीं हैं, जैसा अतीत में कुछ लोग मानते थे। क़ुरआन कहता है कि वे सम्मानित बंदे हैं जो उसके बोलने से पहले नहीं बोलते और उसके हुक्म पर चलते हैं। मुसलमान यह भी कहते हैं कि वे ईमान वालों के लिए दुआ करते हैं और फ़रिश्ते ज़िक्र की महफ़िलों और क़ुरआन की तिलावत में शामिल होते हैं।

क़ुरआन से

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَٰٓئِكَةِ إِنِّى جَاعِلٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ خَلِيفَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَجْعَلُ فِيهَا مَن يُفْسِدُ فِيهَا وَيَسْفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿٣٠﴾

और (ऐ रसूल) उस वक्त क़ो याद करो जब तुम्हारे परवरदिगार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं (अपना) एक नाएब ज़मीन में बनानेवाला हूँ (फरिश्ते ताज्जुब से) कहने लगे क्या तू ज़मीन ऐसे शख्स को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खूँरेज़ियाँ करता फिरे हालाँकि (अगर) ख़लीफा बनाना है (तो हमारा ज्यादा हक़ है) क्योंकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब खुदा ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًۭا وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلْحِجَارَةُ عَلَيْهَا مَلَٰٓئِكَةٌ غِلَاظٌۭ شِدَادٌۭ لَّا يَعْصُونَ ٱللَّهَ مَآ أَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ﴿٦﴾

और बिन ब्याही कुंवारियाँ हो ऐ ईमानदारों अपने आपको और अपने लड़के बालों को (जहन्नुम की) आग से बचाओ जिसके इंधन आदमी और पत्थर होंगे उन पर वह तन्दख़ू सख्त मिजाज़ फ़रिश्ते (मुक़र्रर) हैं कि ख़ुदा जिस बात का हुक्म देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते और जो हुक्म उन्हें मिलता है उसे बजा लाते हैं

ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّن رُّسُلِهِۦ ۚ وَقَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ ﴿٢٨٥﴾

हमारे पैग़म्बर (मोहम्मद) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ से नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाए और उनके (साथ) मोमिनीन भी (सबके) सब ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए (और कहते हैं कि) हम ख़ुदा के पैग़म्बरों में से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते और कहने लगे ऐ हमारे परवरदिगार हमने (तेरा इरशाद) सुना

From the Sunnah

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1 Sahih Muslim 2996 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ رَافِعٍ، وَعَبْدُ بْنُ حُمَيْدٍ، قَالَ عَبْدٌ أَخْبَرَنَا وَقَالَ ابْنُ رَافِعٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الرَّزَّاقِ، أَخْبَرَنَا مَعْمَرٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ خُلِقَتِ الْمَلاَئِكَةُ مِنْ نُورٍ وَخُلِقَ الْجَانُّ مِنْ مَارِجٍ مِنْ نَارٍ وَخُلِقَ آدَمُ مِمَّا وُصِفَ لَكُمْ ‏"‏ ‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 3208 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ الرَّبِيعِ، حَدَّثَنَا أَبُو الأَحْوَصِ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ زَيْدِ بْنِ وَهْبٍ، قَالَ عَبْدُ اللَّهِ حَدَّثَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهْوَ الصَّادِقُ الْمَصْدُوقُ قَالَ ‏ "‏ إِنَّ أَحَدَكُمْ يُجْمَعُ خَلْقُهُ فِي بَطْنِ أُمِّهِ أَرْبَعِينَ يَوْمًا، ثُمَّ يَكُونُ عَلَقَةً مِثْلَ ذَلِكَ، ثُمَّ يَكُونُ مُضْغَةً مِثْلَ ذَلِكَ، ثُمَّ يَبْعَثُ اللَّهُ مَلَكًا، فَيُؤْمَرُ بِأَرْبَعِ كَلِمَاتٍ، وَيُقَالُ لَهُ اكْتُبْ عَمَلَهُ وَرِزْقَهُ وَأَجَلَهُ وَشَقِيٌّ أَوْ سَعِيدٌ‏.‏ ثُمَّ يُنْفَخُ فِيهِ الرُّوحُ، فَإِنَّ الرَّجُلَ مِنْكُمْ لَيَعْمَلُ حَتَّى مَا يَكُونُ بَيْنَهُ وَبَيْنَ الْجَنَّةِ إِلاَّ ذِرَاعٌ، فَيَسْبِقُ عَلَيْهِ كِتَابُهُ، فَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ النَّارِ، وَيَعْمَلُ حَتَّى مَا يَكُونُ بَيْنَهُ وَبَيْنَ النَّارِ إِلاَّ ذِرَاعٌ، فَيَسْبِقُ عَلَيْهِ الْكِتَابُ، فَيَعْمَلُ بِعَمَلِ أَهْلِ الْجَنَّةِ ‏"‏‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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