क्या दूसरों का मज़ाक़ उड़ाना हराम है?

हराम बोलचाल और अख़लाक़ क़ुरआन · 1

संक्षिप्त जवाब

जी हाँ। अल्लाह फ़रमाता है कि लोग दूसरों का मज़ाक़ न उड़ाएँ, क्योंकि हो सकता है वे उनसे बेहतर हों, और एक-दूसरे को बुरे लक़ब से न पुकारें (49:11)।

दलील

क़ुरआन

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا يَسْخَرْ قَوْمٌۭ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُونُوا۟ خَيْرًۭا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَآءٌۭ مِّن نِّسَآءٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُنَّ خَيْرًۭا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا۟ بِٱلْأَلْقَٰبِ ۖ بِئْسَ ٱلِٱسْمُ ٱلْفُسُوقُ بَعْدَ ٱلْإِيمَٰنِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ﴿١١﴾

ऐ ईमानदारों (तुम किसी क़ौम का) कोई मर्द ( दूसरी क़ौम के मर्दों की हँसी न उड़ाये मुमकिन है कि वह लोग (ख़ुदा के नज़दीक) उनसे अच्छे हों और न औरते औरतों से (तमसख़ुर करें) क्या अजब है कि वह उनसे अच्छी हों और तुम आपस में एक दूसरे को मिलने न दो न एक दूसरे का बुरा नाम धरो ईमान लाने के बाद बदकारी (का) नाम ही बुरा है और जो लोग बाज़ न आएँ तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं

यह आम जानकारी है, फ़तवा नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी योग्य आलिम से पूछें।

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