मुसलमान क्यों मानते हैं कि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है?

क़ुरआन और पैग़ंबर क़ुरआन · 3 Hadith · 1

संक्षिप्त जवाब

मुसलमान इसे कई कारणों से मानते हैं: क़ुरआन की बेमिसाल शैली, 23 साल की वह्य में उसकी आंतरिक संगति, अल्लाह और इंसान के बारे में उसकी सटीक शिक्षाएँ, उसका अनुसरण करने वालों में उसके लाए बदलाव, और हर संदेह करने वाले के लिए उसकी अपनी चुनौती कि वह ऐसी कोई चीज़ ले आए।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन लोगों को उस पर ग़ौर करने की दावत देता है और कहता है कि अगर यह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता तो वे इसमें बहुत से विरोधाभास पाते। वह उस जैसा एक अध्याय लाने की चुनौती देता है, और मुसलमान कहते हैं कि यह चुनौती 1,400 साल से खुली है। इसकी अरबी को ग़ैर-मुस्लिम अरबी विद्वान भी वाक्पटुता का चमत्कार मानते हैं।

मुसलमान का विश्वास केवल बौद्धिक नहीं होता। बहुत से लोग इसे पढ़ने का एक निजी अनुभव बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें इसमें अपने सवालों के जवाब मिले। मुसलमान लोगों का स्वागत करते हैं कि वे इसे अनुवाद में, खुले मन से पढ़ें और इससे सवाल पूछें।

क़ुरआन से

أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ ٱلْقُرْءَانَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ ٱللَّهِ لَوَجَدُوا۟ فِيهِ ٱخْتِلَٰفًۭا كَثِيرًۭا ﴿٨٢﴾

तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते

وَإِن كُنتُمْ فِى رَيْبٍۢ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍۢ مِّن مِّثْلِهِۦ وَٱدْعُوا۟ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ ﴿٢٣﴾

और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन्दे (मोहम्मद) पर नाज़िल किया है शक में पड़े हो पस अगर तुम सच्चे हो तो तुम (भी) एक सूरा बना लाओ और खुदा के सिवा जो भी तुम्हारे मददगार हों उनको भी बुला लो

قُل لَّئِنِ ٱجْتَمَعَتِ ٱلْإِنسُ وَٱلْجِنُّ عَلَىٰٓ أَن يَأْتُوا۟ بِمِثْلِ هَٰذَا ٱلْقُرْءَانِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِۦ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍۢ ظَهِيرًۭا ﴿٨٨﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि (अगर सारे दुनिया जहाँन के) आदमी और जिन इस बात पर इकट्ठे हो कि उस क़ुरान का मिसल ले आएँ तो (ना मुमकिन) उसके बराबर नहीं ला सकते अगरचे (उसको कोशिश में) एक का एक मददगार भी बने

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 4981 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يُوسُفَ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، حَدَّثَنَا سَعِيدٌ الْمَقْبُرِيُّ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَا مِنَ الأَنْبِيَاءِ نَبِيٌّ إِلاَّ أُعْطِيَ مَا مِثْلُهُ آمَنَ عَلَيْهِ الْبَشَرُ، وَإِنَّمَا كَانَ الَّذِي أُوتِيتُ وَحْيًا أَوْحَاهُ اللَّهُ إِلَىَّ فَأَرْجُو أَنْ أَكُونَ أَكْثَرَهُمْ تَابِعًا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ‏"‏‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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