इस्लाम में युद्ध के नियम क्या हैं?

शांति, युद्ध, जिहाद और हिंसा क़ुरआन · 4 Hadith · 2 स्रोत · 1

संक्षिप्त जवाब

लड़ाई केवल हमले से बचाव या ज़ुल्म रोकने के लिए जायज़ है, और जब दुश्मन शांति माँगे तो रुक जानी चाहिए। औरतों, बच्चों, बुज़ुर्गों, राहिबों और दूसरे उन लोगों को क़त्ल करना जो लड़ते नहीं, और फ़सलें, पेड़ और घर तबाह करना हराम है।

विस्तृत जवाब

पैग़ंबर ﷺ ने अपनी सेनाओं को हिदायत दी: 'ग़द्दारी न करो, अंग-भंग न करो, किसी बच्चे को क़त्ल न करो।' उनके उत्तराधिकारी अबू बक्र ने सेनापति से कहा कि औरतों, बच्चों और बुज़ुर्गों को क़त्ल न करे, फलदार पेड़ न काटे, खाने के सिवा किसी भेड़ को ज़बह न करे और राहिबों को उनके हाल पर छोड़ दे। यातना और आग से जलाना हराम है, क़ैदियों को खाना खिलाया जाए और उनसे इंसानियत से पेश आया जाए, और संधियों का पालन किया जाए।

क़ुरआन मुसलमानों से कहता है कि केवल उन्हीं से लड़ें जो उनसे लड़ते हैं, हदों को पार न करें, और जब शांति की पेशकश हो तो उसे क़बूल करें। मुस्लिम आलिमों ने इन्हीं नियमों के आधार पर आतंकवाद और आम नागरिकों की हत्या की निंदा की है, जो इस्लाम के युद्ध-नियमों से कोसों दूर हैं। मुसलमान मानते हैं कि उनकी सेनाओं ने हमेशा इन नियमों का पालन नहीं किया, लेकिन नियम साफ़ हैं।

क़ुरआन से

وَقَٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَٰتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ ﴿١٩٠﴾

और जो लोग तुम से लड़े तुम (भी) ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो और ज्यादती न करो (क्योंकि) ख़ुदा ज्यादती करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता

۞ وَإِن جَنَحُوا۟ لِلسَّلْمِ فَٱجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿٦١﴾

और अगर ये कुफ्फार सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और ख़ुदा पर भरोसा रखो (क्योंकि) वह बेशक (सब कुछ) सुनता जानता है

لَّا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمْ يُقَٰتِلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَٰرِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوٓا۟ إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾

जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُحِلُّوا۟ شَعَٰٓئِرَ ٱللَّهِ وَلَا ٱلشَّهْرَ ٱلْحَرَامَ وَلَا ٱلْهَدْىَ وَلَا ٱلْقَلَٰٓئِدَ وَلَآ ءَآمِّينَ ٱلْبَيْتَ ٱلْحَرَامَ يَبْتَغُونَ فَضْلًۭا مِّن رَّبِّهِمْ وَرِضْوَٰنًۭا ۚ وَإِذَا حَلَلْتُمْ فَٱصْطَادُوا۟ ۚ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَـَٔانُ قَوْمٍ أَن صَدُّوكُمْ عَنِ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ أَن تَعْتَدُوا۟ ۘ وَتَعَاوَنُوا۟ عَلَى ٱلْبِرِّ وَٱلتَّقْوَىٰ ۖ وَلَا تَعَاوَنُوا۟ عَلَى ٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ ﴿٢﴾

ऐ ईमानदारों (देखो) न ख़ुदा की निशानियों की बेतौक़ीरी करो और न हुरमत वाले महिने की और न क़ुरबानी की और न पट्टे वाले जानवरों की (जो नज़रे ख़ुदा के लिए निशान देकर मिना में ले जाते हैं) और न ख़ानाए काबा की तवाफ़ (व ज़ियारत) का क़स्द करने वालों की जो अपने परवरदिगार की ख़ुशनूदी और फ़ज़ल (व करम) के जोयाँ हैं और जब तुम (एहराम) खोल दो तो शिकार कर सकते हो और किसी क़बीले की यह अदावत कि तुम्हें उन लोगों ने ख़ानाए काबा (में जाने) से रोका था इस जुर्म में न फॅसवा दे कि तुम उनपर ज्यादती करने लगो और (तुम्हारा तो फ़र्ज यह है कि ) नेकी और परहेज़गारी में एक दूसरे की मदद किया करो और गुनाह और ज्यादती में बाहम किसी की मदद न करो और ख़ुदा से डरते रहो (क्योंकि) ख़ुदा तो यक़ीनन बड़ा सख्त अज़ाब वाला है

From the Sunnah

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1 Sahih Muslim 1731c प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

وَحَدَّثَنِي حَجَّاجُ بْنُ الشَّاعِرِ، حَدَّثَنِي عَبْدُ الصَّمَدِ بْنُ عَبْدِ الْوَارِثِ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، حَدَّثَنِي عَلْقَمَةُ بْنُ مَرْثَدٍ، أَنَّ سُلَيْمَانَ بْنَ بُرَيْدَةَ، حَدَّثَهُ عَنْ أَبِيهِ، قَالَ كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا بَعَثَ أَمِيرًا أَوْ سَرِيَّةً دَعَاهُ فَأَوْصَاهُ ‏.‏ وَسَاقَ الْحَدِيثَ بِمَعْنَى حَدِيثِ سُفْيَانَ ‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 3166 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا قَيْسُ بْنُ حَفْصٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا مُجَاهِدٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو ـ رضى الله عنهما ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ قَتَلَ مُعَاهَدًا لَمْ يَرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا تُوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ أَرْبَعِينَ عَامًا ‏"‏‏.‏

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स्रोत

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  • Abu Bakr's instructions to the army: Muwatta of Imam Malik, Book of Jihad (a mursal report).

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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