'तलवार की आयत' (9:5) का क्या अर्थ है?

शांति, युद्ध, जिहाद और हिंसा क़ुरआन · 2 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

आयत 9:5 मूर्तिपूजक अरब क़बीलों के साथ एक ख़ास जंग के बारे में है जिन्होंने अपनी संधि तोड़ दी थी और मुसलमानों पर हमला किया था। यह कहीं भी और कभी भी ग़ैर-मुस्लिमों को क़त्ल करने का आदेश नहीं है, जैसा अगली आयतें साफ़ करती हैं।

विस्तृत जवाब

इससे पहले की आयतें (9:1-4) बताती हैं कि जिन मुशरिकों ने अपना वादा निभाया उनसे संधियाँ उनकी अवधि तक निभाई जाएँ, और यह आयत उनके बारे में है जिन्होंने संधि तोड़ी। इसके ठीक बाद आयत 9:6 आदेश देती है: अगर उनमें से कोई पनाह माँगे तो उसे पनाह दो, और उसे सुरक्षित जगह तक पहुँचाओ। आयत 9:7 और 9:13 कारण बताती हैं: उन्होंने अपनी क़समें तोड़ीं और पहले हमला किया।

इब्ने कसीर और तबरी जैसे शास्त्रीय आलिमों ने इसे इसके संदर्भ में पढ़ा, और बहुत से आधुनिक आलिम यही बात ज़ोर देकर कहते हैं। अकेले लेने पर कोई भी पाठ ग़लत इस्तेमाल हो सकता है, और जो इसे यह दावा करने के लिए उद्धृत करते हैं कि इस्लाम ग़ैर-मुस्लिमों को क़त्ल करने का हुक्म देता है, वे इसके संदर्भ को और 2:256, 60:8 और 109:6 जैसी आयतों को अनदेखा करते हैं।

क़ुरआन से

فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍۢ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿٥﴾ وَإِنْ أَحَدٌۭ مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ٱسْتَجَارَكَ فَأَجِرْهُ حَتَّىٰ يَسْمَعَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ أَبْلِغْهُ مَأْمَنَهُۥ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَعْلَمُونَ ﴿٦﴾

फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ पाओ (बे ताम्मुल) कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कैद करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग (अब भी शिर्क से) बाज़ आऎं और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो (उनसे ताअरूज़ न करो) बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह ख़ुदा का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं

لَّا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمْ يُقَٰتِلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَٰرِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوٓا۟ إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾

जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 4655 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ عُفَيْرٍ، قَالَ حَدَّثَنِي اللَّيْثُ، قَالَ حَدَّثَنِي عُقَيْلٌ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، وَأَخْبَرَنِي حُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ بَعَثَنِي أَبُو بَكْرٍ فِي تِلْكَ الْحَجَّةِ فِي مُؤَذِّنِينَ، بَعَثَهُمْ يَوْمَ النَّحْرِ يُؤَذِّنُونَ بِمِنًى أَنْ لاَ يَحُجَّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ، وَلاَ يَطُوفَ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ‏.‏ قَالَ حُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ ثُمَّ أَرْدَفَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِعَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ، وَأَمَرَهُ أَنْ يُؤَذِّنَ بِبَرَاءَةَ‏.‏ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ فَأَذَّنَ مَعَنَا عَلِيٌّ يَوْمَ النَّحْرِ فِي أَهْلِ مِنًى بِبَرَاءَةَ، وَأَنْ لاَ يَحُجَّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ، وَلاَ يَطُوفَ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 3166 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا قَيْسُ بْنُ حَفْصٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا مُجَاهِدٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو ـ رضى الله عنهما ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ قَتَلَ مُعَاهَدًا لَمْ يَرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا تُوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ أَرْبَعِينَ عَامًا ‏"‏‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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