क़ुरआन की 76वीं सूरत

सूरह Al-Insan

मदनी 31 आयतें पारा 29
Al-Insan

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

هَلْ أَتَىٰ عَلَى ٱلْإِنسَٰنِ حِينٌۭ مِّنَ ٱلدَّهْرِ لَمْ يَكُن شَيْـًۭٔا مَّذْكُورًا ﴿١﴾

बेशक इन्सान पर एक ऐसा वक्त अा चुका है कि वह कोई चीज़ क़ाबिले ज़िक्र न था

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّا خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ مِن نُّطْفَةٍ أَمْشَاجٍۢ نَّبْتَلِيهِ فَجَعَلْنَٰهُ سَمِيعًۢا بَصِيرًا ﴿٢﴾

हमने इन्सान को मख़लूत नुत्फे से पैदा किया कि उसे आज़माये तो हमने उसे सुनता देखता बनाया

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّا هَدَيْنَٰهُ ٱلسَّبِيلَ إِمَّا شَاكِرًۭا وَإِمَّا كَفُورًا ﴿٣﴾

और उसको रास्ता भी दिखा दिया (अब वह) ख्वाह शुक्र गुज़ार हो ख्वाह नाशुक्रा

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّآ أَعْتَدْنَا لِلْكَٰفِرِينَ سَلَٰسِلَا۟ وَأَغْلَٰلًۭا وَسَعِيرًا ﴿٤﴾

हमने काफ़िरों के ज़ंजीरे, तौक और दहकती हुई आग तैयार कर रखी है

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ يَشْرَبُونَ مِن كَأْسٍۢ كَانَ مِزَاجُهَا كَافُورًا ﴿٥﴾

बेशक नेकोकार लोग शराब के वह सागर पियेंगे जिसमें काफूर की आमेज़िश होगी ये एक चश्मा है जिसमें से ख़ुदा के (ख़ास) बन्दे पियेंगे

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

عَيْنًۭا يَشْرَبُ بِهَا عِبَادُ ٱللَّهِ يُفَجِّرُونَهَا تَفْجِيرًۭا ﴿٦﴾

और जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

يُوفُونَ بِٱلنَّذْرِ وَيَخَافُونَ يَوْمًۭا كَانَ شَرُّهُۥ مُسْتَطِيرًۭا ﴿٧﴾

ये वह लोग हैं जो नज़रें पूरी करते हैं और उस दिन से जिनकी सख्ती हर तरह फैली होगी डरते हैं

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَيُطْعِمُونَ ٱلطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ مِسْكِينًۭا وَيَتِيمًۭا وَأَسِيرًا ﴿٨﴾

और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ ٱللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمْ جَزَآءًۭ وَلَا شُكُورًا ﴿٩﴾

(और कहते हैं कि) हम तो तुमको बस ख़ालिस ख़ुदा के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّا نَخَافُ مِن رَّبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًۭا قَمْطَرِيرًۭا ﴿١٠﴾

हमको तो अपने परवरदिगार से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे (और) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

فَوَقَىٰهُمُ ٱللَّهُ شَرَّ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمِ وَلَقَّىٰهُمْ نَضْرَةًۭ وَسُرُورًۭا ﴿١١﴾

तो ख़ुदा उन्हें उस दिन की तकलीफ़ से बचा लेगा और उनको ताज़गी और ख़ुशदिली अता फरमाएगा

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَجَزَىٰهُم بِمَا صَبَرُوا۟ جَنَّةًۭ وَحَرِيرًۭا ﴿١٢﴾

और उनके सब्र के बदले (बेहिश्त के) बाग़ और रेशम (की पोशाक) अता फ़रमाएगा

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

مُّتَّكِـِٔينَ فِيهَا عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ ۖ لَا يَرَوْنَ فِيهَا شَمْسًۭا وَلَا زَمْهَرِيرًۭا ﴿١٣﴾

वहाँ वह तख्तों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे न वहाँ (आफताब की) धूप देखेंगे और न शिद्दत की सर्दी

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَدَانِيَةً عَلَيْهِمْ ظِلَٰلُهَا وَذُلِّلَتْ قُطُوفُهَا تَذْلِيلًۭا ﴿١٤﴾

और घने दरख्तों के साए उन पर झुके हुए होंगे और मेवों के गुच्छे उनके बहुत क़रीब हर तरह उनके एख्तेयार में

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَيُطَافُ عَلَيْهِم بِـَٔانِيَةٍۢ مِّن فِضَّةٍۢ وَأَكْوَابٍۢ كَانَتْ قَوَارِيرَا۠ ﴿١٥﴾

और उनके सामने चाँदी के साग़र और शीशे के निहायत शफ्फ़ाफ़ गिलास का दौर चल रहा होगा

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

قَوَارِيرَا۟ مِن فِضَّةٍۢ قَدَّرُوهَا تَقْدِيرًۭا ﴿١٦﴾

और शीशे भी (काँच के नहीं) चाँदी के जो ठीक अन्दाज़े के मुताबिक बनाए गए हैं

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَيُسْقَوْنَ فِيهَا كَأْسًۭا كَانَ مِزَاجُهَا زَنجَبِيلًا ﴿١٧﴾

और वहाँ उन्हें ऐसी शराब पिलाई जाएगी जिसमें जनजबील (के पानी) की आमेज़िश होगी

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

عَيْنًۭا فِيهَا تُسَمَّىٰ سَلْسَبِيلًۭا ﴿١٨﴾

ये बेहश्त में एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

۞ وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَٰنٌۭ مُّخَلَّدُونَ إِذَا رَأَيْتَهُمْ حَسِبْتَهُمْ لُؤْلُؤًۭا مَّنثُورًۭا ﴿١٩﴾

और उनके सामने हमेशा एक हालत पर रहने वाले नौजवाल लड़के चक्कर लगाते होंगे कि जब तुम उनको देखो तो समझो कि बिखरे हुए मोती हैं

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَإِذَا رَأَيْتَ ثَمَّ رَأَيْتَ نَعِيمًۭا وَمُلْكًۭا كَبِيرًا ﴿٢٠﴾

और जब तुम वहाँ निगाह उठाओगे तो हर तरह की नेअमत और अज़ीमुश शान सल्तनत देखोगे

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

عَٰلِيَهُمْ ثِيَابُ سُندُسٍ خُضْرٌۭ وَإِسْتَبْرَقٌۭ ۖ وَحُلُّوٓا۟ أَسَاوِرَ مِن فِضَّةٍۢ وَسَقَىٰهُمْ رَبُّهُمْ شَرَابًۭا طَهُورًا ﴿٢١﴾

उनके ऊपर सब्ज़ क्रेब और अतलस की पोशाक होगी और उन्हें चाँदी के कंगन पहनाए जाएँगे और उनका परवरदिगार उन्हें निहायत पाकीज़ा शराब पिलाएगा

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّ هَٰذَا كَانَ لَكُمْ جَزَآءًۭ وَكَانَ سَعْيُكُم مَّشْكُورًا ﴿٢٢﴾

ये यक़ीनी तुम्हारे लिए होगा और तुम्हारी (कारगुज़ारियों के) सिले में और तुम्हारी कोशिश क़ाबिले शुक्र गुज़ारी है

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ ٱلْقُرْءَانَ تَنزِيلًۭا ﴿٢٣﴾

(ऐ रसूल) हमने तुम पर क़ुरान को रफ्ता रफ्ता करके नाज़िल किया

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

فَٱصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تُطِعْ مِنْهُمْ ءَاثِمًا أَوْ كَفُورًۭا ﴿٢٤﴾

तो तुम अपने परवरदिगार के हुक्म के इन्तज़ार में सब्र किए रहो और उन लोगों में से गुनाहगार और नाशुक्रे की पैरवी न करना

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَٱذْكُرِ ٱسْمَ رَبِّكَ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًۭا ﴿٢٥﴾

सुबह शाम अपने परवरदिगार का नाम लेते रहो

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَمِنَ ٱلَّيْلِ فَٱسْجُدْ لَهُۥ وَسَبِّحْهُ لَيْلًۭا طَوِيلًا ﴿٢٦﴾

और कुछ रात गए उसका सजदा करो और बड़ी रात तक उसकी तस्बीह करते रहो

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ يُحِبُّونَ ٱلْعَاجِلَةَ وَيَذَرُونَ وَرَآءَهُمْ يَوْمًۭا ثَقِيلًۭا ﴿٢٧﴾

ये लोग यक़ीनन दुनिया को पसन्द करते हैं और बड़े भारी दिन को अपने पसे पुश्त छोड़ बैठे हैं

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

نَّحْنُ خَلَقْنَٰهُمْ وَشَدَدْنَآ أَسْرَهُمْ ۖ وَإِذَا شِئْنَا بَدَّلْنَآ أَمْثَٰلَهُمْ تَبْدِيلًا ﴿٢٨﴾

हमने उनको पैदा किया और उनके आज़ा को मज़बूत बनाया और अगर हम चाहें तो उनके बदले उन्हीं के जैसे लोग ले आएँ

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

إِنَّ هَٰذِهِۦ تَذْكِرَةٌۭ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًۭا ﴿٢٩﴾

बेशक ये कुरान सरासर नसीहत है तो जो शख़्श चाहे अपने परवरदिगार की राह ले

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا ﴿٣٠﴾

और जब तक ख़ुदा को मंज़ूर न हो तुम लोग कुछ भी चाह नहीं सकते बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफकार दाना है

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

يُدْخِلُ مَن يَشَآءُ فِى رَحْمَتِهِۦ ۚ وَٱلظَّٰلِمِينَ أَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًۢا ﴿٣١﴾

जिसको चाहे अपनी रहमत में दाख़िल कर ले और ज़ालिमों के वास्ते उसने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है

तफ़्सीर अल-मुयस्सर (अरबी)

Al-Insan 31 में से आयत 1

अरबी पाठ: उस्मानी लिपि। अनुवाद: Suhel Farooq Khan and Saifur Rahman Nadwi। ऑडियो: everyayah.com।

सूरह Al-Insan के बारे में

सूरह Al-Insan (الإنسان) क़ुरआन की 76वीं सूरत है। इसमें 31 आयतें हैं और यह पारा 29 में है। इसे मदनी सूरत माना जाता है, यानी यह मुख्यतः नबी ﷺ की मदीना हिजरत के बाद उतरी।

इसका नाम, الإنسان, अरबी में इस सूरत की पहचान है।

सूरह Al-Insan के बारे में प्रश्न

सूरह Al-Insan में कितनी आयतें हैं?

सूरह Al-Insan में 31 आयतें हैं।

सूरह Al-Insan मक्की है या मदनी?

वर्गीकरण: मदनी।

सूरह Al-Insan किस पारे में है?

सूरह Al-Insan पारा 29 में है।

मैं सूरह Al-Insan कहाँ सुन सकता हूँ?

इसे आयत-दर-आयत सुनने के लिए इस पन्ने पर प्ले दबाएँ, क़ारी: अब्दुर्रहमान अस-सुदैस, मिशारी अल-अफ़ासी, महमूद ख़लील अल-हुसरी, अब्दुल बासित अब्दुस-समद, माहिर अल-मुऐक़िली, साद अल-ग़ामिदी, अहमद अल-अजमी, अबू बक्र अश-शातरी, हानी अर-रिफ़ाई, मुहम्मद सिद्दीक़ अल-मिंशावी, अली अल-हुज़ैफ़ी, मुहम्मद अय्यूब, अब्दुल्लाह बसफ़र, यासिर अद-दौसरी, नासिर अल-क़तामी, सलाह अल-बुदैर, सऊद अश-शुरैम, अब्दुल्लाह अवाद अल-जुहनी, मुहम्मद जिब्रील।

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