क्या मुसलमान काबा या काले पत्थर की इबादत करते हैं?

आम भ्रांतियाँ क़ुरआन · 3 Hadith · 1

संक्षिप्त जवाब

नहीं। मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करते हैं। काबा नमाज़ की दिशा और इब्राहीम का बनाया इबादत का घर है। काले पत्थर को हाजी इसलिए चूमते या छूते हैं कि पैग़ंबर ﷺ ने ऐसा किया, इसलिए नहीं कि उसमें कोई ताक़त है।

विस्तृत जवाब

दूसरे ख़लीफ़ा उमर ने काले पत्थर के सामने खड़े होकर कहा: 'मैं जानता हूँ कि तू बस एक पत्थर है जो न फ़ायदा देता है न नुक़सान, और अगर मैंने पैग़ंबर को तुझे चूमते न देखा होता तो मैं तुझे न चूमता।' जो हाजी उस तक नहीं पहुँच पाते वे बस उसकी ओर इशारा कर देते हैं। मुसलमान अल्लाह से दुआ करते हैं, काबा से नहीं, और दुनिया में कहीं भी वे एकता की निशानी के रूप में उसकी ओर रुख़ करते हैं।

पैग़ंबर ﷺ ने काबा के भीतर की मूर्तियाँ तोड़ दीं और उसे एक अल्लाह की इबादत के घर के रूप में बहाल किया। इस्लाम में न काबा, न पत्थर और न पैग़ंबर की क़ब्र इबादत की चीज़ें हैं।

क़ुरआन से

وَإِذْ جَعَلْنَا ٱلْبَيْتَ مَثَابَةًۭ لِّلنَّاسِ وَأَمْنًۭا وَٱتَّخِذُوا۟ مِن مَّقَامِ إِبْرَٰهِۦمَ مُصَلًّۭى ۖ وَعَهِدْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِۦمَ وَإِسْمَٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْعَٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ ﴿١٢٥﴾

(ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो

إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍۢ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِى بِبَكَّةَ مُبَارَكًۭا وَهُدًۭى لِّلْعَٰلَمِينَ ﴿٩٦﴾

लोगों (की इबादत) के वास्ते जो घर सबसे पहले बनाया गया वह तो यक़ीनन यही (काबा) है जो मक्के में है बड़ी (खैर व बरकत) वाला और सारे जहॉन के लोगों का रहनुमा

وَإِذْ بَوَّأْنَا لِإِبْرَٰهِيمَ مَكَانَ ٱلْبَيْتِ أَن لَّا تُشْرِكْ بِى شَيْـًۭٔا وَطَهِّرْ بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْقَآئِمِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ ﴿٢٦﴾

और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब हमने इबराहीम के ज़रिये से इबरहीम के वास्ते ख़ानए काबा की जगह ज़ाहिर कर दी (और उनसे कहा कि) मेरा किसी चीज़ को शरीक न बनाना और मेरे घर को तवाफ और क़याम और रूकू सुजूद करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखना

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 1597 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ كَثِيرٍ، أَخْبَرَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ عَابِسِ بْنِ رَبِيعَةَ، عَنْ عُمَرَ ـ رضى الله عنه ـ أَنَّهُ جَاءَ إِلَى الْحَجَرِ الأَسْوَدِ فَقَبَّلَهُ، فَقَالَ إِنِّي أَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لاَ تَضُرُّ وَلاَ تَنْفَعُ، وَلَوْلاَ أَنِّي رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يُقَبِّلُكَ مَا قَبَّلْتُكَ‏.‏

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