क्या मुसलमान यहूदियों और ईसाइयों से नफ़रत करते हैं?

आम भ्रांतियाँ क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

नहीं। क़ुरआन मूसा और ईसा का आदर करता है, यहूदियों और ईसाइयों का अहले-किताब के रूप में आदर के साथ ज़िक्र करता है, और मुसलमानों को उनका खाना खाने और उनकी औरतों से विवाह की इजाज़त देता है। मुसलमानों से कहा गया है कि सबके साथ इंसाफ़ करें, और यहूदी-विरोधी या ईसाई-विरोधी नफ़रत आस्था का हिस्सा नहीं है।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन उनमें से समूहों के कुछ अक़ीदों और कुछ बर्तावों की आलोचना करता है, जैसे वह कुछ मुसलमानों की भी आलोचना करता है, लेकिन वह यह भी कहता है कि वे सब एक जैसे नहीं हैं: उनमें वे हैं जो सीधे हैं, जो रात में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और सजदा करते हैं। पैग़ंबर ﷺ एक यहूदी के जनाज़े के लिए खड़े हुए और यहूदी पड़ोसियों के साथ रहे।

राजनीतिक संघर्ष, जैसे इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष, कुछ मुसलमानों में ग़ुस्सा पैदा करता है और कुछ कठोर शब्द इस्तेमाल करते हैं, और कुछ ग़लत तरीक़े से इसे एक क़ौम के रूप में यहूदियों के ख़िलाफ़ मोड़ देते हैं। मुस्लिम आलिम कहते हैं कि यह ज़मीन और अधिकारों का मामला है, धर्म का नहीं, और मुसलमानों को किसी राज्य के कर्मों और यहूदी लोगों के बीच फ़र्क़ करना चाहिए। यहूदी और मुस्लिम समुदाय सदियों तक साथ रहे, स्पेन में, उस्मानी इलाक़ों में और उत्तरी अफ़्रीका में।

क़ुरआन से

۞ لَيْسُوا۟ سَوَآءًۭ ۗ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَٰبِ أُمَّةٌۭ قَآئِمَةٌۭ يَتْلُونَ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ ءَانَآءَ ٱلَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ ﴿١١٣﴾ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَيُسَٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَأُو۟لَٰٓئِكَ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ ﴿١١٤﴾

और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि) अहले किताब से कुछ लोग तो ऐसे हैं कि (ख़ुदा के दीन पर) इस तरह साबित क़दम हैं कि रातों को ख़ुदा की आयतें पढ़ा करते हैं और वह बराबर सजदे किया करते हैं खुदा और रोज़े आख़ेरत पर ईमान रखते हैं और अच्छे काम का तो हुक्म करते हैं और बुरे कामों से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ पड़ते हैं और यही लोग तो नेक बन्दों से हैं

۞ لَتَجِدَنَّ أَشَدَّ ٱلنَّاسِ عَدَٰوَةًۭ لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱلْيَهُودَ وَٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ ۖ وَلَتَجِدَنَّ أَقْرَبَهُم مَّوَدَّةًۭ لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱلَّذِينَ قَالُوٓا۟ إِنَّا نَصَٰرَىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًۭا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ﴿٨٢﴾

(ऐ रसूल) ईमान लाने वालों का दुशमन सबसे बढ़के यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमानदारों का दोस्ती में सबसे बढ़के क़रीब उन लोगों को पाओगे जो अपने को नसारा कहते हैं क्योंकि इन (नसारा) में से यक़ीनी बहुत से आमिल और आबिद हैं और इस सबब से (भी) कि ये लोग हरगिज़ शेख़ी नहीं करते

لَّا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمْ يُقَٰتِلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَٰرِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوٓا۟ إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾

जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 1311 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا مُعَاذُ بْنُ فَضَالَةَ، حَدَّثَنَا هِشَامٌ، عَنْ يَحْيَى، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ مِقْسَمٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ ـ رضى الله عنهما ـ قَالَ مَرَّ بِنَا جَنَازَةٌ فَقَامَ لَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَقُمْنَا بِهِ‏.‏ فَقُلْنَا يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّهَا جَنَازَةُ يَهُودِيٍّ‏.‏ قَالَ ‏ "‏ إِذَا رَأَيْتُمُ الْجَنَازَةَ فَقُومُوا ‏"‏‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 1312 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا آدَمُ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، حَدَّثَنَا عَمْرُو بْنُ مُرَّةَ، قَالَ سَمِعْتُ عَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ أَبِي لَيْلَى، قَالَ كَانَ سَهْلُ بْنُ حُنَيْفٍ وَقَيْسُ بْنُ سَعْدٍ قَاعِدَيْنِ بِالْقَادِسِيَّةِ، فَمَرُّوا عَلَيْهِمَا بِجَنَازَةٍ فَقَامَا‏.‏ فَقِيلَ لَهُمَا إِنَّهَا مِنْ أَهْلِ الأَرْضِ، أَىْ مِنْ أَهْلِ الذِّمَّةِ فَقَالاَ إِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم مَرَّتْ بِهِ جَنَازَةٌ فَقَامَ فَقِيلَ لَهُ إِنَّهَا جَنَازَةُ يَهُودِيٍّ‏.‏ فَقَالَ ‏ "‏ أَلَيْسَتْ نَفْسًا ‏"‏‏.‏ وَقَالَ أَبُو حَمْزَةَ عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ عَمْرٍو، عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى، قَالَ كُنْتُ مَعَ قَيْسٍ وَسَهْلٍ ـ رضى الله عنهما ـ فَقَالاَ كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم‏.‏ وَقَالَ زَكَرِيَّاءُ عَنِ الشَّعْبِيِّ عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى كَانَ أَبُو مَسْعُودٍ وَقَيْسٌ يَقُومَانِ لِلْجِنَازَةِ‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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