हज, यानी मक्का की यात्रा, क्या है?

नमाज़, रोज़ा, हज और इबादत क़ुरआन · 3 Hadith · 1

संक्षिप्त जवाब

हज इस्लामी महीने ज़ुल-हिज्जा में मक्का की सालाना यात्रा है, जो इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। हर वह मुसलमान जो शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम है, उस पर जीवन में एक बार इसे अदा करना फ़र्ज़ है।

विस्तृत जवाब

हर देश से लाखों हाजी सादे सफ़ेद वस्त्रों (एहराम) में इकट्ठा होते हैं ताकि कोई ओहदा या दौलत न दिखे। वे काबा का तवाफ़ करते हैं, सफ़ा और मरवा के बीच चलते हैं, जो हाजरा की अपने बेटे इसमाईल के लिए पानी की तलाश की याद दिलाता है, अरफ़ात के मैदान में खड़े होकर दुआ करते हैं, और मुज़दलिफ़ा और मिना में रातें गुज़ारते हैं। अंत में वे जानवर की क़ुर्बानी देते हैं और गोश्त ग़रीबों में बाँटते हैं।

हज नबी इब्राहीम और उनके परिवार के क़दमों पर चलना है। बहुत से हाजी इसे अपने जीवन का सबसे भावुक अनुभव बताते हैं: अल्लाह के सामने सब बराबर हैं, और जो इसे ठीक से अदा करता है वह, पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया, गुनाहों से ऐसे पाक होकर लौटता है जैसे उस दिन जब उसकी माँ ने उसे जना। एक छोटी यात्रा, उमरा, साल के किसी भी समय की जा सकती है।

क़ुरआन से

فِيهِ ءَايَٰتٌۢ بَيِّنَٰتٌۭ مَّقَامُ إِبْرَٰهِيمَ ۖ وَمَن دَخَلَهُۥ كَانَ ءَامِنًۭا ۗ وَلِلَّهِ عَلَى ٱلنَّاسِ حِجُّ ٱلْبَيْتِ مَنِ ٱسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًۭا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ عَنِ ٱلْعَٰلَمِينَ ﴿٩٧﴾

इसमें (हुरमत की) बहुत सी वाज़े और रौशन निशानियॉ हैं (उनमें से) मुक़ाम इबराहीम है (जहॉ आपके क़दमों का पत्थर पर निशान है) और जो इस घर में दाख़िल हुआ अमन में आ गया और लोगों पर वाजिब है कि महज़ ख़ुदा के लिए ख़ानाए काबा का हज करें जिन्हे वहां तक पहुँचने की इस्तेताअत है और जिसने बावजूद कुदरत हज से इन्कार किया तो (याद रखे) कि ख़ुदा सारे जहॉन से बेपरवा है

وَأَذِّن فِى ٱلنَّاسِ بِٱلْحَجِّ يَأْتُوكَ رِجَالًۭا وَعَلَىٰ كُلِّ ضَامِرٍۢ يَأْتِينَ مِن كُلِّ فَجٍّ عَمِيقٍۢ ﴿٢٧﴾

और लोगों को हज की ख़बर कर दो कि लोग तुम्हारे पास (ज़ूक दर ज़ूक) ज्यादा और हर तरह की दुबली (सवारियों पर जो राह दूर दराज़ तय करके आयी होगी चढ़-चढ़ के) आ पहुँचेगें

۞ إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ ﴿١٥٨﴾

बेशक (कोहे) सफ़ा और (कोह) मरवा ख़ुदा की निशानियों में से हैं पस जो शख्स ख़ानए काबा का हज या उमरा करे उस पर उन दोनो के (दरमियान) तवाफ़ (आमद ओ रफ्त) करने में कुछ गुनाह नहीं (बल्कि सवाब है) और जो शख्स खुश खुश नेक काम करे तो फिर ख़ुदा भी क़दरदाँ (और) वाक़िफ़कार है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 1521 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا آدَمُ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، حَدَّثَنَا سَيَّارٌ أَبُو الْحَكَمِ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا حَازِمٍ، قَالَ سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ مَنْ حَجَّ لِلَّهِ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ ‏"‏‏.‏

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