मुसलमान रमज़ान में रोज़ा क्यों रखते हैं?

नमाज़, रोज़ा, हज और इबादत क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

मुसलमान इस्लामी कैलेंडर के नौवें महीने रमज़ान में रोज़ा रखते हैं, क्योंकि अल्लाह ने उनके लिए इसे फ़र्ज़ किया है। क़ुरआन के अनुसार इसका मक़सद है अल्लाह से और डरने वाला बनना और संयम व शुक्रगुज़ारी में बढ़ना।

विस्तृत जवाब

फ़ज्र से सूर्यास्त तक रोज़ेदार मुसलमान न खाता है, न पीता है और न पति-पत्नी का संबंध रखता है। रोज़ा इंसान को झूठ, ग़ुस्से और चुग़ली से बचना भी सिखाता है। सूर्यास्त पर वे खजूर और पानी से रोज़ा खोलते हैं और परिवार और पड़ोसियों के साथ खाना बाँटते हैं। मस्जिदों में तरावीह नाम की ख़ास रात की नमाज़ें पढ़ी जाती हैं, और मुसलमान ज़्यादा क़ुरआन पढ़ते हैं, क्योंकि यह इसी महीने में पहली बार उतरा था।

रोज़ा भूखों के लिए हमदर्दी और उन सब चीज़ों के लिए शुक्रगुज़ारी सिखाता है जिन्हें हम आमतौर पर मामूली समझते हैं। बच्चे, बीमार, मुसाफ़िर, बुज़ुर्ग और गर्भवती, दूध पिलाने वाली या माहवारी वाली औरतें छूट पाती हैं या बाद में दिन पूरे कर सकती हैं। रमज़ान ईद-उल-फ़ित्र के त्योहार पर ख़त्म होता है, जिसमें ख़ास नमाज़, दान और परिवार की दावत होती है।

क़ुरआन से

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿١٨٣﴾

ऐ ईमानदारों रोज़ा रखना जिस तरह तुम से पहले के लोगों पर फर्ज था उसी तरफ तुम पर भी फर्ज़ किया गया ताकि तुम उस की वजह से बहुत से गुनाहों से बचो

شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًۭى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٍۢ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿١٨٥﴾

(रोज़ों का) महीना रमज़ान है जिस में क़ुरान नाज़िल किया गया जो लोगों का रहनुमा है और उसमें रहनुमाई और (हक़ व बातिल के) तमीज़ की रौशन निशानियाँ हैं (मुसलमानों) तुम में से जो शख्स इस महीनें में अपनी जगह पर हो तो उसको चाहिए कि रोज़ा रखे और जो शख्स बीमार हो या फिर सफ़र में हो तो और दिनों में रोज़े की गिनती पूरी करे ख़ुदा तुम्हारे साथ आसानी करना चाहता है और तुम्हारे साथ सख्ती करनी नहीं चाहता और (शुमार का हुक्म इस लिए दिया है) ताकि तुम (रोज़ो की) गिनती पूरी करो और ताकि ख़ुदा ने जो तुम को राह पर लगा दिया है उस नेअमत पर उस की बड़ाई करो और ताकि तुम शुक्र गुज़ार बनो

أَيَّامًۭا مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌۭ طَعَامُ مِسْكِينٍۢ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿١٨٤﴾

(वह भी हमेशा नहीं बल्कि) गिनती के चन्द रोज़ इस पर भी (रोज़े के दिनों में) जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दिनों में जितने क़ज़ा हुए हो) गिन के रख ले और जिन्हें रोज़ा रखने की कूवत है और न रखें तो उन पर उस का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है और जो शख्स अपनी ख़ुशी से भलाई करे तो ये उस के लिए ज्यादा बेहतर है और अगर तुम समझदार हो तो (समझ लो कि फिदये से) रोज़ा रखना तुम्हारे हक़ में बहरहाल अच्छा है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 38 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
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حَدَّثَنَا ابْنُ سَلاَمٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا مُحَمَّدُ بْنُ فُضَيْلٍ، قَالَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ، عَنْ أَبِي سَلَمَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ‏"‏‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 1894 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
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حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنْ أَبِي الزِّنَادِ، عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ الصِّيَامُ جُنَّةٌ، فَلاَ يَرْفُثْ وَلاَ يَجْهَلْ، وَإِنِ امْرُؤٌ قَاتَلَهُ أَوْ شَاتَمَهُ فَلْيَقُلْ إِنِّي صَائِمٌ‏.‏ مَرَّتَيْنِ، وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ لَخُلُوفُ فَمِ الصَّائِمِ أَطْيَبُ عِنْدَ اللَّهِ تَعَالَى مِنْ رِيحِ الْمِسْكِ، يَتْرُكُ طَعَامَهُ وَشَرَابَهُ وَشَهْوَتَهُ مِنْ أَجْلِي، الصِّيَامُ لِي، وَأَنَا أَجْزِي بِهِ، وَالْحَسَنَةُ بِعَشْرِ أَمْثَالِهَا ‏"‏‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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