शरीअत क़ानून क्या है?

शरीअत, अधिकार और समाज Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

शरीअत का अर्थ है राह या रास्ता, और यह इस्लाम का जीने के बारे में पूरा मार्गदर्शन है: इबादत, ईमानदारी, परिवार, कारोबार और इंसाफ़। इसका केवल एक छोटा हिस्सा आपराधिक क़ानून है। ज़्यादातर हिस्सा इस बारे में है कि मुसलमान कैसे नमाज़ पढ़ता है, दान देता है और दूसरों से बर्ताव करता है।

विस्तृत जवाब

शरीअत क़ुरआन और सुन्नत से आती है, और फ़िक़्ह में व्यक्त होती है, जो इसे लागू करने के बारे में आलिमों की इंसानी समझ है। इसी वजह से सुन्नी क़ानून के चारों मसलक और दूसरे कभी-कभी अलग राय रखते हैं। शरीअत किसी किताब में लिखी कोई एक निश्चित संहिता नहीं है: यह उन हुक्मों का समूह है जो आलिम दलील के साथ निकालते हैं।

ग़ैर-मुस्लिम देश में रहने वाले मुसलमान के लिए शरीअत का अर्थ ज़्यादातर नमाज़, रोज़ा और ईमानदार लेन-देन जैसे निजी कर्तव्य हैं, और ज़्यादातर समुदायों में स्थानीय क़ानून को बदलने की कोई इच्छा नहीं है। मुसलमान इस पर बहुत अलग राय रखते हैं कि राज्य को इसे कितना लागू करना चाहिए। आप इस वेबसाइट के फ़िक़्ह भाग में मुख्य हुक्म उनकी दलीलों के साथ पढ़ सकते हैं।

From the Sunnah

The authentic hadith behind this answer, from Sahih al-Bukhari, Sahih Muslim and the Sunan with the grade of the scholars of hadith. Open a reference to read it in the hadith library of this site.

1 Sahih al-Bukhari 39 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا عَبْدُ السَّلاَمِ بْنُ مُطَهَّرٍ، قَالَ حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ عَلِيٍّ، عَنْ مَعْنِ بْنِ مُحَمَّدٍ الْغِفَارِيِّ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ أَبِي سَعِيدٍ الْمَقْبُرِيِّ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ إِنَّ الدِّينَ يُسْرٌ، وَلَنْ يُشَادَّ الدِّينَ أَحَدٌ إِلاَّ غَلَبَهُ، فَسَدِّدُوا وَقَارِبُوا وَأَبْشِرُوا، وَاسْتَعِينُوا بِالْغَدْوَةِ وَالرَّوْحَةِ وَشَىْءٍ مِنَ الدُّلْجَةِ ‏"‏‏.‏

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2 Sahih Muslim 2564a प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مَسْلَمَةَ بْنِ قَعْنَبٍ، حَدَّثَنَا دَاوُدُ، - يَعْنِي ابْنَ قَيْسٍ - عَنْ أَبِي، سَعِيدٍ مَوْلَى عَامِرِ بْنِ كُرَيْزٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ تَحَاسَدُوا وَلاَ تَنَاجَشُوا وَلاَ تَبَاغَضُوا وَلاَ تَدَابَرُوا وَلاَ يَبِعْ بَعْضُكُمْ عَلَى بَيْعِ بَعْضٍ وَكُونُوا عِبَادَ اللَّهِ إِخْوَانًا ‏.‏ الْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ لاَ يَظْلِمُهُ وَلاَ يَخْذُلُهُ وَلاَ يَحْقِرُهُ ‏.‏ التَّقْوَى هَا هُنَا ‏"‏ ‏.‏ وَيُشِيرُ إِلَى صَدْرِهِ ثَلاَثَ مَرَّاتٍ ‏"‏ بِحَسْبِ امْرِئٍ مِنَ الشَّرِّ أَنْ يَحْقِرَ أَخَاهُ الْمُسْلِمَ كُلُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ حَرَامٌ دَمُهُ وَمَالُهُ وَعِرْضُهُ ‏"‏ ‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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