इस्लाम में जीवन का उद्देश्य क्या है?

इस्लाम की बुनियादी बातें क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

इस्लाम सिखाता है कि अल्लाह ने इंसानों को इसलिए पैदा किया कि वे उसे जानें, उसकी इबादत करें और धरती पर भलाई करें। जीवन एक इम्तिहान है, और इसमें इंसान जो करता है उसी से आख़िरत में उसकी ख़ुशहाली तय होती है।

विस्तृत जवाब

इस्लाम में इबादत रस्मों से कहीं बड़ी चीज़ है। ईमानदारी से काम करना, परिवार की देखभाल, पड़ोसी की मदद, जानवरों के साथ नरमी और यहाँ तक कि मुस्कान भी, जब अल्लाह की ख़ातिर हो, इबादत में गिनी जाती है। कुछ भी बेकार नहीं जाता: हर नेक काम लिखा जाता है, और सब्र के साथ सही गई हर मुश्किल पर सवाब मिलता है।

मुसलमान मानते हैं कि यह जीवन छोटा है और अगला जीवन हमेशा का है। उन्हें कहा गया है कि अल्लाह ने जो अच्छी चीज़ें जायज़ की हैं उनका आनंद लें, काम करें, विवाह करें और दुनिया में हिस्सा लें, यह याद रखते हुए कि उन्हें अल्लाह की ओर लौटना है और अपने जीने का हिसाब देना है।

क़ुरआन से

وَمَا خَلَقْتُ ٱلْجِنَّ وَٱلْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ﴿٥٦﴾

और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें

ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْمَوْتَ وَٱلْحَيَوٰةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًۭا ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفُورُ ﴿٢﴾

जिसने मौत और ज़िन्दगी को पैदा किया ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें से काम में सबसे अच्छा कौन है और वह ग़ालिब (और) बड़ा बख्शने वाला है

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَٰٓئِكَةِ إِنِّى جَاعِلٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ خَلِيفَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَجْعَلُ فِيهَا مَن يُفْسِدُ فِيهَا وَيَسْفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿٣٠﴾

और (ऐ रसूल) उस वक्त क़ो याद करो जब तुम्हारे परवरदिगार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं (अपना) एक नाएब ज़मीन में बनानेवाला हूँ (फरिश्ते ताज्जुब से) कहने लगे क्या तू ज़मीन ऐसे शख्स को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खूँरेज़ियाँ करता फिरे हालाँकि (अगर) ख़लीफा बनाना है (तो हमारा ज्यादा हक़ है) क्योंकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब खुदा ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते

From the Sunnah

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1 Jami' at-Tirmidhi 2417 Sahih (Al-Albani)
Arabic text

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَخْبَرَنَا الأَسْوَدُ بْنُ عَامِرٍ، حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ عَيَّاشٍ، عَنِ الأَعْمَشِ، عَنْ سَعِيدِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جُرَيْجٍ، عَنْ أَبِي بَرْزَةَ الأَسْلَمِيِّ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ لاَ تَزُولُ قَدَمَا عَبْدٍ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حَتَّى يُسْأَلَ عَنْ عُمْرِهِ فِيمَا أَفْنَاهُ وَعَنْ عِلْمِهِ فِيمَا فَعَلَ وَعَنْ مَالِهِ مِنْ أَيْنَ اكْتَسَبَهُ وَفِيمَا أَنْفَقَهُ وَعَنْ جِسْمِهِ فِيمَا أَبْلاَهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ صَحِيحٌ ‏.‏ وَسَعِيدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ جُرَيْجٍ هُوَ بَصْرِيٌّ وَهُوَ مَوْلَى أَبِي بَرْزَةَ وَأَبُو بَرْزَةَ اسْمُهُ نَضْلَةُ بْنُ عُبَيْدٍ ‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 6412 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا الْمَكِّيُّ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ سَعِيدٍ ـ هُوَ ابْنُ أَبِي هِنْدٍ ـ عَنْ أَبِيهِ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ ـ رضى الله عنهما ـ قَالَ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ نِعْمَتَانِ مَغْبُونٌ فِيهِمَا كَثِيرٌ مِنَ النَّاسِ، الصِّحَّةُ وَالْفَرَاغُ ‏"‏‏.‏ قَالَ عَبَّاسٌ الْعَنْبَرِيُّ حَدَّثَنَا صَفْوَانُ بْنُ عِيسَى، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سَعِيدِ بْنِ أَبِي هِنْدٍ، عَنْ أَبِيهِ، سَمِعْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مِثْلَهُ‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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