क़ुरआन कहता है कि जो इस्लाम के सिवा कोई और दीन चाहे, वह उससे क़बूल नहीं किया जाएगा, और यह भी कहता है कि अल्लाह किसी क़ौम को तब तक सज़ा नहीं देता जब तक उनके पास कोई रसूल साफ़ संदेश के साथ न आ जाए। आलिम समझाते हैं कि जिन तक इस्लाम का संदेश कभी साफ़ तौर पर नहीं पहुँचा, या बिगड़े रूप में पहुँचा, उनकी क़यामत के दिन परीक्षा होगी और उनका इंसाफ़ से फ़ैसला होगा। क़ुरआन यहूदियों, ईसाइयों और साबियों के उन समूहों का भी ज़िक्र करता है जो अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते और नेक काम करते हैं, और कहता है कि उनका बदला उनके लिए है।
पैग़ंबर ﷺ ने सिखाया कि अल्लाह की रहमत उसके ग़ुस्से पर भारी है। इसलिए मुसलमान सबके लिए रहमत की उम्मीद रखते हैं, लोगों को नरमी के साथ इस्लाम की दावत देते हैं, और अंतिम फ़ैसला अल्लाह पर छोड़ते हैं। मुसलमान यह ज़रूर मानते हैं कि सच जान लेने के बाद उसे ठुकराना एक गंभीर बात है।