क्या इस्लाम पति को अपनी पत्नी को मारने की इजाज़त देता है?

औरतें, परिवार और विवाह क़ुरआन · 3 Hadith · 3

संक्षिप्त जवाब

नहीं। इस्लाम विवाह में ज़्यादती को हराम करता है। पैग़ंबर ﷺ ने कभी किसी औरत या नौकर पर हाथ नहीं उठाया, और उन्होंने फ़रमाया, 'तुममें सबसे अच्छे वे हैं जो अपनी पत्नियों के लिए सबसे अच्छे हैं।' जिस आयत (4:34) का हवाला दिया जाता है उसे व्यापक रूप से ग़लत पढ़ा जाता है।

विस्तृत जवाब

आयत 4:34 पति के लिए उस स्थिति में क़दमों की सूची देती है जब पत्नी बेवफ़ा हो: नसीहत करे, फिर बिस्तर में अलग हो जाए और, आख़िरी क़दम के रूप में, 'ज़रबा'। इतिहास भर में आलिमों ने कहा कि यह नुक़सान की इजाज़त नहीं देता। पैग़ंबर ﷺ ने मारने को नापसंद किया और कहा 'जो ऐसा करते हैं वे तुममें सबसे अच्छे नहीं हैं'। जिन्होंने इसे बिल्कुल भी जायज़ कहा, जैसे कुछ शास्त्रीय फ़क़ीह, उन्होंने कहा कि यह प्रतीकात्मक होना चाहिए, जैसे मिस्वाक से, उससे दर्द न हो और निशान न पड़े, और यह चेहरे पर कभी न हो। बहुत से आधुनिक आलिम 'ज़रबा' का अर्थ अलग होना या छोड़ देना पढ़ते हैं।

जो बात पक्की है वह यह है कि मुसलमानों को आदेश है कि अपनी पत्नियों के साथ भलाई से रहें, और शारीरिक या मानसिक नुक़सान पहुँचाना हराम है। घरेलू हिंसा एक जुर्म है जिसे कोई मुसलमान ईमान के नाम पर सही नहीं ठहरा सकता, और पीड़ितों को मदद और सुरक्षा माँगने की प्रेरणा दी जाती है।

क़ुरआन से

ٱلرِّجَالُ قَوَّٰمُونَ عَلَى ٱلنِّسَآءِ بِمَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ وَبِمَآ أَنفَقُوا۟ مِنْ أَمْوَٰلِهِمْ ۚ فَٱلصَّٰلِحَٰتُ قَٰنِتَٰتٌ حَٰفِظَٰتٌۭ لِّلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ ٱللَّهُ ۚ وَٱلَّٰتِى تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَٱهْجُرُوهُنَّ فِى ٱلْمَضَاجِعِ وَٱضْرِبُوهُنَّ ۖ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا۟ عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيًّۭا كَبِيرًۭا ﴿٣٤﴾

मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि (एक तो) ख़ुदा ने बाज़ आदमियों (मर्द) को बाज़ अदमियों (औरत) पर फ़ज़ीलत दी है और (इसके अलावा) चूंकि मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं (और) उनके पीठ पीछे जिस तरह ख़ुदा ने हिफ़ाज़त की वह भी (हर चीज़ की) हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो मगर इतना कि खून न निकले और कोई अज़ो न (टूटे) पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाएं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूंढो ख़ुदा तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग़ है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَرِثُوا۟ ٱلنِّسَآءَ كَرْهًۭا ۖ وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا۟ بِبَعْضِ مَآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّآ أَن يَأْتِينَ بِفَٰحِشَةٍۢ مُّبَيِّنَةٍۢ ۚ وَعَاشِرُوهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ فَإِن كَرِهْتُمُوهُنَّ فَعَسَىٰٓ أَن تَكْرَهُوا۟ شَيْـًۭٔا وَيَجْعَلَ ٱللَّهُ فِيهِ خَيْرًۭا كَثِيرًۭا ﴿١٩﴾

ऐ ईमानदारों तुमको ये जायज़ नहीं कि (अपने मुरिस की) औरतों से (निकाह कर) के (ख्वाह मा ख्वाह) ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और जो कुछ तुमने उन्हें (शौहर के तर्के से) दिया है उसमें से कुछ (आपस से कुछ वापस लेने की नीयत से) उन्हें दूसरे के साथ (निकाह करने से) न रोको हॉ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें तो अलबत्ता रोकने में (मज़ाएक़ा (हर्ज)नहीं) और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो (तो भी सब्र करो क्योंकि) अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और ख़ुदा तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे

وَمِنْ ءَايَٰتِهِۦٓ أَنْ خَلَقَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًۭا لِّتَسْكُنُوٓا۟ إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُم مَّوَدَّةًۭ وَرَحْمَةً ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَتَفَكَّرُونَ ﴿٢١﴾

और उसी की (क़ुदरत) की निशानियों में से एक ये (भी) है कि उसने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी ही जिन्स की बीवियाँ पैदा की ताकि तुम उनके साथ रहकर चैन करो और तुम लोगों के दरमेयान प्यार और उलफ़त पैदा कर दी इसमें शक नहीं कि इसमें ग़ौर करने वालों के वास्ते (क़ुदरते ख़ुदा की) यक़ीनी बहुत सी निशानियाँ हैं

From the Sunnah

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1 Sahih Muslim 2328a प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
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حَدَّثَنَاهُ أَبُو كُرَيْبٍ، حَدَّثَنَا أَبُو أُسَامَةَ، عَنْ هِشَامٍ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ مَا ضَرَبَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم شَيْئًا قَطُّ بِيَدِهِ وَلاَ امْرَأَةً وَلاَ خَادِمًا إِلاَّ أَنْ يُجَاهِدَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَمَا نِيلَ مِنْهُ شَىْءٌ قَطُّ فَيَنْتَقِمَ مِنْ صَاحِبِهِ إِلاَّ أَنْ يُنْتَهَكَ شَىْءٌ مِنْ مَحَارِمِ اللَّهِ فَيَنْتَقِمَ لِلَّهِ عَزَّ وَجَلَّ ‏.‏

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2 Sunan Abi Dawud 2146 Sahih (Al-Albani)
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حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ أَبِي خَلَفٍ، وَأَحْمَدُ بْنُ عَمْرِو بْنِ السَّرْحِ، قَالاَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، - قَالَ ابْنُ السَّرْحِ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ - عَنْ إِيَاسِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِي ذُبَابٍ، قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لاَ تَضْرِبُوا إِمَاءَ اللَّهِ ‏"‏ ‏.‏ فَجَاءَ عُمَرُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ ذَئِرْنَ النِّسَاءُ عَلَى أَزْوَاجِهِنَّ ‏.‏ فَرَخَّصَ فِي ضَرْبِهِنَّ فَأَطَافَ بِآلِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم نِسَاءٌ كَثِيرٌ يَشْكُونَ أَزْوَاجَهُنَّ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لَقَدْ طَافَ بِآلِ مُحَمَّدٍ نِسَاءٌ كَثِيرٌ يَشْكُونَ أَزْوَاجَهُنَّ لَيْسَ أُولَئِكَ بِخِيَارِكُمْ ‏"‏ ‏.‏

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3 Jami' at-Tirmidhi 3895 Sahih (Al-Albani)
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حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، قَالَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ، قَالَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ خَيْرُكُمْ خَيْرُكُمْ لأَهْلِهِ وَأَنَا خَيْرُكُمْ لأَهْلِي وَإِذَا مَاتَ صَاحِبُكُمْ فَدَعُوهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ غَرِيبٌ صَحِيحٌ مِنْ حَدِيثِ الثَّوْرِيِّ مَا أَقَلَّ مَنْ رَوَاهُ عَنِ الثَّوْرِيِّ ‏.‏ وَرُوِيَ هَذَا عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مُرْسَلٌ ‏.‏

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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