क्या इस्लाम में औरत की गवाही या विरासत मर्द के आधे के बराबर है?

औरतें, परिवार और विवाह क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

आम तौर पर नहीं। अल्लाह के सामने औरत का मूल्य मर्द के बराबर है। जिन दो नियमों का हवाला दिया जाता है वे सीमित हैं: क़ुरआन लिखित आर्थिक अनुबंध में एक मर्द की जगह दो औरतों को गवाह बनाने को कहता है, और विरासत के कुछ मामलों में बेटी को बेटे के हिस्से का आधा देता है।

विस्तृत जवाब

विरासत में बेटे को बेटी से दोगुना हिस्सा इसलिए मिलता है कि इस्लामी क़ानून के अनुसार वह अपनी पत्नी, बच्चों और अक्सर अपने माता-पिता और बहनों की देखभाल का ज़िम्मेदार है, जबकि बेटी का हिस्सा केवल उसका अपना है, और उसे किसी पर ख़र्च करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं। कई दूसरे मामलों में औरतें मर्दों के बराबर या उनसे ज़्यादा विरासत पाती हैं: जैसे माँ और बाप को हर एक को छठा हिस्सा मिलता है, और कुछ मामलों में बेटी को भाई से ज़्यादा मिलता है।

गवाही की आयत एक क़र्ज़ के अनुबंध के बारे में है, जब औरतें कारोबार की कम आदी थीं, और एक दूसरी को याद दिला सकती थी। दूसरे मामलों में, जैसे धार्मिक ज्ञान के स्रोत के रूप में आइशा की गवाही, औरत की बात पूरी तरह मानी जाती है। आलिम इस पर अलग राय रखते हैं कि इसे आधुनिक अदालतों में कैसे लागू किया जाए।

क़ुरआन से

يُوصِيكُمُ ٱللَّهُ فِىٓ أَوْلَٰدِكُمْ ۖ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۚ فَإِن كُنَّ نِسَآءًۭ فَوْقَ ٱثْنَتَيْنِ فَلَهُنَّ ثُلُثَا مَا تَرَكَ ۖ وَإِن كَانَتْ وَٰحِدَةًۭ فَلَهَا ٱلنِّصْفُ ۚ وَلِأَبَوَيْهِ لِكُلِّ وَٰحِدٍۢ مِّنْهُمَا ٱلسُّدُسُ مِمَّا تَرَكَ إِن كَانَ لَهُۥ وَلَدٌۭ ۚ فَإِن لَّمْ يَكُن لَّهُۥ وَلَدٌۭ وَوَرِثَهُۥٓ أَبَوَاهُ فَلِأُمِّهِ ٱلثُّلُثُ ۚ فَإِن كَانَ لَهُۥٓ إِخْوَةٌۭ فَلِأُمِّهِ ٱلسُّدُسُ ۚ مِنۢ بَعْدِ وَصِيَّةٍۢ يُوصِى بِهَآ أَوْ دَيْنٍ ۗ ءَابَآؤُكُمْ وَأَبْنَآؤُكُمْ لَا تَدْرُونَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ لَكُمْ نَفْعًۭا ۚ فَرِيضَةًۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا ﴿١١﴾

(मुसलमानों) ख़ुदा तुम्हारी औलाद के हक़ में तुमसे वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है और अगर (मय्यत की) औलाद में सिर्फ लड़कियॉ ही हों (दो) या (दो) से ज्यादा तो उनका (मक़र्रर हिस्सा) कुल तर्के का दो तिहाई है और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा है और मय्यत के बाप मॉ हर एक का अगर मय्यत की कोई औलाद मौजूद न हो तो माल मुस्तरद का में से मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) छटा हिस्सा है और अगर मय्यत के कोई औलाद न हो और उसके सिर्फ मॉ बाप ही वारिस हों तो मॉ का मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) एक तिहाई हिस्सा तय है और बाक़ी बाप का लेकिन अगर मय्यत के (हक़ीक़ी और सौतेले) भाई भी मौजूद हों तो (अगरचे उन्हें कुछ न मिले) उस वक्त मॉ का हिस्सा छठा ही होगा (और वह भी) मय्यत नें जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तालीम और (अदाए) क़र्ज़ के बाद तुम्हारे बाप हों या बेटे तुम तो यह नहीं जानते हों कि उसमें कौन तुम्हारी नाफ़रमानी में ज्यादा क़रीब है (फिर तुम क्या दख़ल दे सकते हो) हिस्सा तो सिर्फ ख़ुदा की तरफ़ से मुअय्यन होता है क्योंकि ख़ुदा तो ज़रूर हर चीज़ को जानता और तदबीर वाला है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى فَٱكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُمْ كَاتِبٌۢ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ ٱللَّهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْـًۭٔا ۚ فَإِن كَانَ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُۥ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَٱسْتَشْهِدُوا۟ شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌۭ وَٱمْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ ٱلشُّهَدَآءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَىٰهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَىٰهُمَا ٱلْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ ٱلشُّهَدَآءُ إِذَا مَا دُعُوا۟ ۚ وَلَا تَسْـَٔمُوٓا۟ أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰٓ أَجَلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَٰدَةِ وَأَدْنَىٰٓ أَلَّا تَرْتَابُوٓا۟ ۖ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَٰرَةً حَاضِرَةًۭ تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوٓا۟ إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَآرَّ كَاتِبٌۭ وَلَا شَهِيدٌۭ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا۟ فَإِنَّهُۥ فُسُوقٌۢ بِكُمْ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱللَّهُ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ ﴿٢٨٢﴾

ऐ ईमानदारों जब एक मियादे मुक़र्ररा तक के लिए आपस में क़र्ज क़ा लेन देन करो तो उसे लिखा पढ़ी कर लिया करो और लिखने वाले को चाहिये कि तुम्हारे दरमियान तुम्हारे क़ौल व क़रार को, इन्साफ़ से ठीक ठीक लिखे और लिखने वाले को लिखने से इन्कार न करना चाहिये (बल्कि) जिस तरह ख़ुदा ने उसे (लिखना पढ़ना) सिखाया है उसी तरह उसको भी वे उज़्र (बहाना) लिख देना चाहिये और जिसके ज़िम्मे क़र्ज़ आयद होता है उसी को चाहिए कि (तमस्सुक) की इबारत बताता जाये और ख़ुदा से डरे जो उसका सच्चा पालने वाला है डरता रहे और (बताने में) और क़र्ज़ देने वाले के हुक़ूक़ में कुछ कमी न करे अगर क़र्ज़ लेने वाला कम अक्ल या माज़ूर या ख़ुद (तमस्सुक) का मतलब लिखवा न सकता हो तो उसका सरपरस्त ठीक ठीक इन्साफ़ से लिखवा दे और अपने लोगों में से जिन लोगों को तुम गवाही लेने के लिये पसन्द करो (कम से कम) दो मर्दों की गवाही कर लिया करो फिर अगर दो मर्द न हो तो (कम से कम) एक मर्द और दो औरतें (क्योंकि) उन दोनों में से अगर एक भूल जाएगी तो एक दूसरी को याद दिला देगी, और जब गवाह हुक्काम के सामने (गवाही के लिए) बुलाया जाएं तो हाज़िर होने से इन्कार न करे और क़र्ज़ का मामला ख्वाह छोटा हो या उसकी मियाद मुअय्युन तक की (दस्तावेज़) लिखवाने में काहिली न करो, ख़ुदा के नज़दीक ये लिखा पढ़ी बहुत ही मुन्सिफ़ाना कारवाई है और गवाही के लिए भी बहुत मज़बूती है और बहुत क़रीन (क़यास) है कि तुम आईन्दा किसी तरह के शक व शुबहा में न पड़ो मगर जब नक़द सौदा हो जो तुम लोग आपस में उलट फेर किया करते हो तो उसकी (दस्तावेज) के न लिखने में तुम पर कुछ इल्ज़ाम नहीं है (हॉ) और जब उसी तरह की ख़रीद (फ़रोख्त) हो तो गवाह कर लिया करो और क़ातिब (दस्तावेज़) और गवाह को ज़रर न पहुँचाया जाए और अगर तुम ऐसा कर बैठे तो ये ज़रूर तुम्हारी शरारत है और ख़ुदा से डरो ख़ुदा तुमको मामले की सफ़ाई सिखाता है और वह हर चीज़ को ख़ूब जानता है

لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ٱلْوَٰلِدَانِ وَٱلْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ٱلْوَٰلِدَانِ وَٱلْأَقْرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ ۚ نَصِيبًۭا مَّفْرُوضًۭا ﴿٧﴾

मॉ बाप और क़राबतदारों के तर्के में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाब और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख्वाह तर्क कम हो या ज्यादा (हर शख्स का) हिस्सा (हमारी तरफ़ से) मुक़र्रर किया हुआ है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 5971 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، حَدَّثَنَا جَرِيرٌ، عَنْ عُمَارَةَ بْنِ الْقَعْقَاعِ بْنِ شُبْرُمَةَ، عَنْ أَبِي زُرْعَةَ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ جَاءَ رَجُلٌ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَنْ أَحَقُّ بِحُسْنِ صَحَابَتِي قَالَ ‏"‏ أُمُّكَ ‏"‏‏.‏ قَالَ ثُمَّ مَنْ قَالَ ‏"‏ أُمُّكَ ‏"‏‏.‏ قَالَ ثُمَّ مَنْ قَالَ ‏"‏ أُمُّكَ ‏"‏‏.‏ قَالَ ثُمَّ مَنْ قَالَ ‏"‏ ثُمَّ أَبُوكَ ‏"‏‏.‏ وَقَالَ ابْنُ شُبْرُمَةَ وَيَحْيَى بْنُ أَيُّوبَ حَدَّثَنَا أَبُو زُرْعَةَ مِثْلَهُ‏.‏

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2 Jami' at-Tirmidhi 3895 Sahih (Al-Albani)
Arabic text

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يَحْيَى، قَالَ حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ يُوسُفَ، قَالَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ، عَنْ أَبِيهِ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ خَيْرُكُمْ خَيْرُكُمْ لأَهْلِهِ وَأَنَا خَيْرُكُمْ لأَهْلِي وَإِذَا مَاتَ صَاحِبُكُمْ فَدَعُوهُ ‏"‏ ‏.‏ قَالَ أَبُو عِيسَى هَذَا حَدِيثٌ حَسَنٌ غَرِيبٌ صَحِيحٌ مِنْ حَدِيثِ الثَّوْرِيِّ مَا أَقَلَّ مَنْ رَوَاهُ عَنِ الثَّوْرِيِّ ‏.‏ وَرُوِيَ هَذَا عَنْ هِشَامِ بْنِ عُرْوَةَ عَنْ أَبِيهِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم مُرْسَلٌ ‏.‏

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