इस्लाम में तलाक़ कैसे होता है?

औरतें, परिवार और विवाह क़ुरआन · 3 Hadith · 2

संक्षिप्त जवाब

इस्लाम तलाक़ की आख़िरी उपाय के रूप में इजाज़त देता है, सुलह की कोशिशों के बाद। पति तलाक़ से विवाह ख़त्म कर सकता है, पत्नी जज के ज़रिए तलाक़ माँग सकती है (ख़ुला या फ़स्ख़), और हर सूरत में इद्दत की अवधि और दोनों पक्षों के अधिकार होते हैं।

विस्तृत जवाब

पैग़ंबर ﷺ ने तलाक़ को नापसंद किया, और क़ुरआन परिवार के सदस्यों के ज़रिए पंचायत (मध्यस्थता) को बढ़ावा देता है। तलाक़ के बाद लगभग तीन महीने की इद्दत होती है, जिसमें पति को अपनी पत्नी को घर से नहीं निकालना चाहिए, और जिसमें वे सुलह कर सकते हैं। पत्नी अपना मह्र रखती है, और पिता बच्चों का ख़र्च उठाता है।

औरतों को पहल करने का हक़ है: ख़ुला वह तलाक़ है जिसमें पत्नी मह्र लौटा देती है, और जज नुक़सान, उपेक्षा या ख़र्च न देने पर विवाह भंग कर सकता है। व्यवहार में, कुछ देशों में औरतों को अदालतों में मुश्किलें आती हैं, और कुछ जगहों पर तीन बार शब्द दोहराकर तुरंत तलाक़ का रिवाज है, हालाँकि बहुत से आलिमों और कई देशों ने इसे सीमित किया है।

क़ुरआन से

ٱلطَّلَٰقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌۢ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌۢ بِإِحْسَٰنٍۢ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا۟ مِمَّآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ شَيْـًٔا إِلَّآ أَن يَخَافَآ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا ٱفْتَدَتْ بِهِۦ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ﴿٢٢٩﴾

तलाक़ रजअई जिसके बाद रुजू हो सकती है दो ही मरतबा है उसके बाद या तो शरीयत के मवाफिक़ रोक ही लेना चाहिए या हुस्न सुलूक से (तीसरी दफ़ा) बिल्कुल रूख़सत और तुम को ये जायज़ नहीं कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो उस में से फिर कुछ वापस लो मगर जब दोनों को इसका ख़ौफ़ हो कि ख़ुदा ने जो हदें मुक़र्रर कर दी हैं उन को दोनो मिया बीवी क़ायम न रख सकेंगे फिर अगर तुम्हे (ऐ मुसलमानो) ये ख़ौफ़ हो कि यह दोनो ख़ुदा की मुकर्रर की हुई हदो पर क़ायम न रहेंगे तो अगर औरत मर्द को कुछ देकर अपना पीछा छुड़ाए (खुला कराए) तो इसमें उन दोनों पर कुछ गुनाह नहीं है ये ख़ुदा की मुक़र्रर की हुई हदें हैं बस उन से आगे न बढ़ो और जो ख़ुदा की मुक़र्रर की हुईहदों से आगे बढ़ते हैं वह ही लोग तो ज़ालिम हैं

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَأَحْصُوا۟ ٱلْعِدَّةَ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ رَبَّكُمْ ۖ لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِنۢ بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ إِلَّآ أَن يَأْتِينَ بِفَٰحِشَةٍۢ مُّبَيِّنَةٍۢ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۥ ۚ لَا تَدْرِى لَعَلَّ ٱللَّهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذَٰلِكَ أَمْرًۭا ﴿١﴾ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ فَارِقُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍۢ وَأَشْهِدُوا۟ ذَوَىْ عَدْلٍۢ مِّنكُمْ وَأَقِيمُوا۟ ٱلشَّهَٰدَةَ لِلَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ ۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّهُۥ مَخْرَجًۭا ﴿٢﴾

ऐ रसूल (मुसलमानों से कह दो) जब तुम अपनी बीवियों को तलाक़ दो तो उनकी इद्दत (पाकी) के वक्त तलाक़ दो और इद्दा का शुमार रखो और अपने परवरदिगार ख़ुदा से डरो और (इद्दे के अन्दर) उनके घर से उन्हें न निकालो और वह ख़ुद भी घर से न निकलें मगर जब वह कोई सरीही बेहयाई का काम कर बैठें (तो निकाल देने में मुज़ायका नहीं) और ये ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) हदें हैं और जो ख़ुदा की हदों से तजाउज़ करेगा तो उसने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया तो तू नहीं जानता यायद ख़ुदा उसके बाद कोई बात पैदा करे (जिससे मर्द पछताए और मेल हो जाए) तो जब ये अपना इद्दा पूरा करने के करीब पहुँचे तो या तुम उन्हें उनवाने शाइस्ता से रोक लो या अच्छी तरह रूख़सत ही कर दो और (तलाक़ के वक्त) अपने लोगों में से दो आदिलों को गवाह क़रार दे लो और गवाहों तुम ख़ुदा के वास्ते ठीक ठीक गवाही देना इन बातों से उस शख़्श को नसीहत की जाती है जो ख़ुदा और रोजे अाख़ेरत पर ईमान रखता हो और जो ख़ुदा से डरेगा तो ख़ुदा उसके लिए नजात की सूरत निकाल देगा

وَٱلْمُطَلَّقَٰتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَٰثَةَ قُرُوٓءٍۢ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِىٓ أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِى ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوٓا۟ إِصْلَٰحًۭا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ ٱلَّذِى عَلَيْهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌۭ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿٢٢٨﴾

और जिन औरतों को तलाक़ दी गयी है वह अपने आपको तलाक़ के बाद तीन हैज़ के ख़त्म हो जाने तक निकाह सानी से रोके और अगर वह औरतें ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान लायीं हैं तो उनके लिए जाएज़ नहीं है कि जो कुछ भी ख़ुदा ने उनके रहम (पेट) में पैदा किया है उसको छिपाएँ और अगर उन के शौहर मेल जोल करना चाहें तो वह (मुद्दत मज़कूरा) में उन के वापस बुला लेने के ज्यादा हक़दार हैं और शरीयत मुवाफिक़ औरतों का (मर्दों पर) वही सब कुछ हक़ है जो मर्दों का औरतों पर है हाँ अलबत्ता मर्दों को (फ़जीलत में) औरतों पर फौक़ियत ज़रुर है और ख़ुदा ज़बरदस्त हिक़मत वाला है

From the Sunnah

The authentic hadith behind this answer, from Sahih al-Bukhari, Sahih Muslim and the Sunan with the grade of the scholars of hadith. Open a reference to read it in the hadith library of this site.

1 Sahih al-Bukhari 5251 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ حَدَّثَنِي مَالِكٌ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ ـ رضى الله عنهما ـ أَنَّهُ طَلَّقَ امْرَأَتَهُ وَهْىَ حَائِضٌ عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَسَأَلَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ ذَلِكَ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ مُرْهُ فَلْيُرَاجِعْهَا، ثُمَّ لِيُمْسِكْهَا حَتَّى تَطْهُرَ ثُمَّ تَحِيضَ، ثُمَّ تَطْهُرَ، ثُمَّ إِنْ شَاءَ أَمْسَكَ بَعْدُ وَإِنْ شَاءَ طَلَّقَ قَبْلَ أَنْ يَمَسَّ، فَتِلْكَ الْعِدَّةُ الَّتِي أَمَرَ اللَّهُ أَنْ تُطَلَّقَ لَهَا النِّسَاءُ ‏"‏‏.‏

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2 Sahih al-Bukhari 5273 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا أَزْهَرُ بْنُ جَمِيلٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَهَّابِ الثَّقَفِيُّ، حَدَّثَنَا خَالِدٌ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ،‏.‏ أَنَّ امْرَأَةَ، ثَابِتِ بْنِ قَيْسٍ أَتَتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ يَا رَسُولَ اللَّهِ ثَابِتُ بْنُ قَيْسٍ مَا أَعْتُبُ عَلَيْهِ فِي خُلُقٍ وَلاَ دِينٍ، وَلَكِنِّي أَكْرَهُ الْكُفْرَ فِي الإِسْلاَمِ‏.‏ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ أَتَرُدِّينَ عَلَيْهِ حَدِيقَتَهُ ‏"‏‏.‏ قَالَتْ نَعَمْ‏.‏ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ اقْبَلِ الْحَدِيقَةَ وَطَلِّقْهَا تَطْلِيقَةً ‏"‏‏.‏ قَالَ أَبُو عَبْد اللَّهِ لَا يُتَابَعُ فِيهِ عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ

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यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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