क्या इस्लाम धर्म की आज़ादी देता है?

अल्लाह, ईसा और दूसरे धर्म क़ुरआन · 4 Hadith · 1 स्रोत · 1

संक्षिप्त जवाब

जी हाँ। क़ुरआन कहता है कि दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं, और सच गुमराही से साफ़ अलग हो चुका है। किसी को मुसलमान बनने पर मजबूर नहीं किया जा सकता, और किसी की आस्था का फ़ैसला अल्लाह करता है, इंसान नहीं।

विस्तृत जवाब

क़ुरआन पैग़ंबर ﷺ से कहता है कि वे केवल याद दिलाने वाले हैं, लोगों पर नियंत्रण रखने वाले नहीं, और यह भी बताता है कि अगर अल्लाह चाहता तो धरती के सारे लोग ईमान ले आते, और पूछता है कि क्या वे उन्हें मजबूर करेंगे। इस्लाम में ज़बरदस्ती का ईमान क़बूल नहीं, क्योंकि ईमान दिल की बात है।

इतिहास में यहूदी और ईसाई समुदाय सदियों तक मुस्लिम शासन के तहत अपनी अदालतों, गिरजाघरों और आराधनालयों के साथ रहे, और पैग़ंबर ﷺ की शुरुआती जीवनियों में उस सुरक्षा-संधि का ज़िक्र है जो उन्होंने नज्रान के ईसाइयों को दी। इतिहास में असहिष्णुता के बुरे उदाहरण भी हैं, जैसे हर समाज में होते हैं। मुसलमान मानते हैं कि ऐसे उदाहरण क़ुरआन की शिक्षा के ख़िलाफ़ हैं।

क़ुरआन से

لَآ إِكْرَاهَ فِى ٱلدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشْدُ مِنَ ٱلْغَىِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِٱلطَّٰغُوتِ وَيُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسْتَمْسَكَ بِٱلْعُرْوَةِ ٱلْوُثْقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَا ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿٢٥٦﴾

दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है

وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَءَامَنَ مَن فِى ٱلْأَرْضِ كُلُّهُمْ جَمِيعًا ۚ أَفَأَنتَ تُكْرِهُ ٱلنَّاسَ حَتَّىٰ يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ ﴿٩٩﴾

और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सबके सब ईमान ले आते तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सबके सब ईमानदार हो जाएँ हालॉकि किसी शख़्स को ये एख्तेयार नहीं

فَذَكِّرْ إِنَّمَآ أَنتَ مُذَكِّرٌۭ ﴿٢١﴾ لَّسْتَ عَلَيْهِم بِمُصَيْطِرٍ ﴿٢٢﴾

तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ ﴿٦﴾

तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 3166 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا قَيْسُ بْنُ حَفْصٍ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَاحِدِ، حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا مُجَاهِدٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو ـ رضى الله عنهما ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَنْ قَتَلَ مُعَاهَدًا لَمْ يَرَحْ رَائِحَةَ الْجَنَّةِ، وَإِنَّ رِيحَهَا تُوجَدُ مِنْ مَسِيرَةِ أَرْبَعِينَ عَامًا ‏"‏‏.‏

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स्रोत

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  • Treaty with the Christians of Najran: Ibn Hisham, as-Sirah an-Nabawiyyah (an early biography).

यह जवाब मुख्यधारा की सुन्नी समझ का अनुसरण करता है और सामान्य जानकारी है, फ़तवा नहीं। जहाँ मुसलमानों में मतभेद है, जवाब वह बता देता है। क्या आपका अपना कोई सवाल है? हमें लिखें.

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