इस्लाम अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में क्या कहता है?

जीवन, मृत्यु और आख़िरत क़ुरआन · 3 Hadith · 1 स्रोत · 1

संक्षिप्त जवाब

इस्लाम बीमारी को, दिमाग़ की बीमारी समेत, असली मानता है और इलाज कराने की प्रेरणा देता है। वह सिखाता है कि उदासी जीवन का हिस्सा है, कि नमाज़ और अल्लाह का ज़िक्र दिल को सुकून देते हैं और यह भी कि डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

विस्तृत जवाब

पैग़ंबर ﷺ ने फ़रमाया, 'अल्लाह ने कोई बीमारी नहीं उतारी जिसकी दवा न उतारी हो,' और लोगों से इलाज कराने को कहा। अवसाद कमज़ोर ईमान की निशानी नहीं है। नबियों ने ख़ुद ग़म महसूस किया: याक़ूब यूसुफ़ के लिए इतना रोए कि उनकी आँखें सफ़ेद हो गईं, और पैग़ंबर ﷺ ने उस साल को जब उन्होंने अपनी पत्नी और चाचा को खोया 'ग़म का साल' कहा।

मुसलमान नमाज़, क़ुरआन, दान, समुदाय और इस भरोसे में सुकून पाते हैं कि मुश्किल गुज़र जाएगी। ये थेरेपी या दवा के अलावा हैं, उसका विकल्प नहीं। इस्लाम में आत्महत्या हराम है, क्योंकि जीवन अल्लाह की अमानत है, और जिसके मन में ऐसे विचार हों उसे तुरंत किसी डॉक्टर, किसी भरोसेमंद इंसान या संकट हेल्पलाइन से मदद लेनी चाहिए।

क़ुरआन से

ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُم بِذِكْرِ ٱللَّهِ ۗ أَلَا بِذِكْرِ ٱللَّهِ تَطْمَئِنُّ ٱلْقُلُوبُ ﴿٢٨﴾

और जिसने उसकी तरफ रुज़ू की उसे अपनी तरफ पहुँचने की राह दिखाता है (ये) वह लोग हैं जिन्होंने ईमान कुबूल किया और उनके दिलों को ख़ुदा की चाह से तसल्ली हुआ करती है

فَإِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًا ﴿٥﴾

तो (हाँ) पस बेशक दुशवारी के साथ ही आसानी है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَٰطِلِ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَٰرَةً عَن تَرَاضٍۢ مِّنكُمْ ۚ وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًۭا ﴿٢٩﴾

ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन (हॉ) तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो (और उसमें एक दूसरे का माल हो तो मुज़ाएक़ा नहीं) और अपना गला आप घूंट के अपनी जान न दो (क्योंकि) ख़ुदा तो ज़रूर तुम्हारे हाल पर मेहरबान है

From the Sunnah

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1 Sahih al-Bukhari 5678 प्रामाणिक, हदीस के विद्वानों की सहमति से
Arabic text

حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا أَبُو أَحْمَدَ الزُّبَيْرِيُّ، حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ سَعِيدِ بْنِ أَبِي حُسَيْنٍ، قَالَ حَدَّثَنِي عَطَاءُ بْنُ أَبِي رَبَاحٍ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ ‏ "‏ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ دَاءً إِلاَّ أَنْزَلَ لَهُ شِفَاءً ‏"‏‏.‏

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स्रोत

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  • The year of sorrow: Ibn Hisham, as-Sirah an-Nabawiyyah.

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