नबी Muhammad

25 / 25 محمد ﷺ 26 आयतें

क़ुरआन में मुहम्मद ﷺ का नाम चार बार आया है (3:144, 33:40, 47:2 और 48:29)। यह पन्ना उन आयतों में से कुछ को इकट्ठा करता है जो उनसे और उनके बारे में बात करती हैं।

1

आख़िरी नबी, रहमत

अल्लाह फ़रमाता है कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल और नबियों की मुहर हैं। उन्हें गवाह, ख़ुशख़बरी देने वाले और ख़बरदार करने वाले के रूप में भेजा गया, ऐसे जो अल्लाह की इजाज़त से उसकी ओर बुलाते हैं और रौशन चिराग़ हैं, और केवल दुनिया वालों के लिए रहमत बनाकर।

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مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٍۢ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّۦنَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا ﴿٤٠﴾

(लोगों) मोहम्मद तुम्हारे मर्दों में से (हक़ीक़तन) किसी के बाप नहीं हैं (फिर जैद की बीवी क्यों हराम होने लगी) बल्कि अल्लाह के रसूल और नबियों की मोहर (यानी ख़त्म करने वाले) हैं और खुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ है

يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَرْسَلْنَٰكَ شَٰهِدًۭا وَمُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا ﴿٤٥﴾

ऐ नबी हमने तुमको (लोगों का) गवाह और (नेकों को बेहश्त की) खुशख़बरी देने वाला और बदों को अज़ाब से डराने वाला

وَدَاعِيًا إِلَى ٱللَّهِ بِإِذْنِهِۦ وَسِرَاجًۭا مُّنِيرًۭا ﴿٤٦﴾

और खुदा की तरफ उसी के हुक्म से बुलाने वाला और (ईमान व हिदायत का) रौशन चिराग़ बनाकर भेजा

وَمَآ أَرْسَلْنَٰكَ إِلَّا رَحْمَةًۭ لِّلْعَٰلَمِينَ ﴿١٠٧﴾

और (ऐ रसूल) हमने तो तुमको सारे दुनिया जहाँन के लोगों के हक़ में अज़सरतापा रहमत बनाकर भेजा

2

आपके रब ने आपको नहीं छोड़ा

अल्लाह चढ़ते दिन की रौशनी और छा जाने वाली रात की क़सम खाकर फ़रमाता है कि उनके रब ने उन्हें न छोड़ा और न नापसंद किया, कि आख़िरत उनके लिए पहली ज़िंदगी से बेहतर है, और कि उनका रब उन्हें इतना देगा कि वे राज़ी हो जाएँगे। उसने उन्हें यतीम पाया तो ठिकाना दिया, भटका हुआ पाया तो राह दिखाई, तंगदस्त पाया तो मालदार किया। उसने उनका सीना खोल दिया और उनका बोझ उतार दिया: बेशक तंगी के साथ आसानी है।

आयतें दिखाएँ (19)

وَٱلضُّحَىٰ ﴿١﴾

(ऐ रसूल) पहर दिन चढ़े की क़सम

وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ ﴿٢﴾

और रात की जब (चीज़ों को) छुपा ले

مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ ﴿٣﴾

कि तुम्हारा परवरदिगार न तुमको छोड़ बैठा और (न तुमसे) नाराज़ हुआ

وَلَلْءَاخِرَةُ خَيْرٌۭ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ ﴿٤﴾

और तुम्हारे वास्ते आख़ेरत दुनिया से यक़ीनी कहीं बेहतर है

وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ ﴿٥﴾

और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ

أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًۭا فَـَٔاوَىٰ ﴿٦﴾

क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)

وَوَجَدَكَ ضَآلًّۭا فَهَدَىٰ ﴿٧﴾

और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया

وَوَجَدَكَ عَآئِلًۭا فَأَغْنَىٰ ﴿٨﴾

और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया

فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ ﴿٩﴾

तो तुम भी यतीम पर सितम न करना

وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ ﴿١٠﴾

माँगने वाले को झिड़की न देना

وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ ﴿١١﴾

और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना

أَلَمْ نَشْرَحْ لَكَ صَدْرَكَ ﴿١﴾

(ऐ रसूल) क्या हमने तुम्हारा सीना इल्म से कुशादा नहीं कर दिया (जरूर किया)

وَوَضَعْنَا عَنكَ وِزْرَكَ ﴿٢﴾

और तुम पर से वह बोझ उतार दिया

ٱلَّذِىٓ أَنقَضَ ظَهْرَكَ ﴿٣﴾

जिसने तुम्हारी कमर तोड़ रखी थी

وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ ﴿٤﴾

और तुम्हारा ज़िक्र भी बुलन्द कर दिया

فَإِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًا ﴿٥﴾

तो (हाँ) पस बेशक दुशवारी के साथ ही आसानी है

إِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًۭا ﴿٦﴾

यक़ीनन दुश्वारी के साथ आसानी है

فَإِذَا فَرَغْتَ فَٱنصَبْ ﴿٧﴾

तो जब तुम फारिग़ हो जाओ तो मुक़र्रर कर दो

وَإِلَىٰ رَبِّكَ فَٱرْغَب ﴿٨﴾

और फिर अपने परवरदिगार की तरफ रग़बत करो

3

अपनी उम्मत की फ़िक्र

तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आया है। जो तकलीफ़ तुम्हें पहुँचती है वह उन पर भारी है; वे तुम्हारी फ़िक्र रखते हैं, और ईमान वालों के साथ नरम और मेहरबान हैं। अगर वे मुँह फेर लें, तो वे कहते हैं: “मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है।” अल्लाह की रहमत से वे उनके साथ नरम रहे; अगर वे सख़्त और कठोर दिल होते, तो लोग उनके आसपास से बिखर जाते।

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لَقَدْ جَآءَكُمْ رَسُولٌۭ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِٱلْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ ﴿١٢٨﴾

लोगों तुम ही में से (हमारा) एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका (जिसकी शफ़क्क़त (मेहरबानी) की ये हालत है कि) उस पर शाक़ (दुख) है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी बेहूदी का हौका है ईमानदारो पर हद दर्जे रफ़ीक़ मेहरबान हैं

فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقُلْ حَسْبِىَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَهُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ ﴿١٢٩﴾

ऐ रसूल अगर इस पर भी ये लोग (तुम्हारे हुक्म से) मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मेरे लिए ख़ुदा काफी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मैने उस पर भरोसा रखा है वही अर्श (ऐसे) बुर्जूग (मख़लूका का) मालिक है

فَبِمَا رَحْمَةٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ لِنتَ لَهُمْ ۖ وَلَوْ كُنتَ فَظًّا غَلِيظَ ٱلْقَلْبِ لَٱنفَضُّوا۟ مِنْ حَوْلِكَ ۖ فَٱعْفُ عَنْهُمْ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِى ٱلْأَمْرِ ۖ فَإِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُتَوَكِّلِينَ ﴿١٥٩﴾

(तो ऐ रसूल ये भी) ख़ुदा की एक मेहरबानी है कि तुम (सा) नरमदिल (सरदार) उनको मिला और तुम अगर बदमिज़ाज और सख्त दिल होते तब तो ये लोग (ख़ुदा जाने कब के) तुम्हारे गिर्द से तितर बितर हो गए होते पस (अब भी) तुम उनसे दरगुज़र करो और उनके लिए मग़फेरत की दुआ मॉगो और (साबिक़ दस्तूरे ज़ाहिरा) उनसे काम काज में मशवरा कर लिया करो (मगर) इस पर भी जब किसी काम को ठान लो तो ख़ुदा ही पर भरोसा रखो (क्योंकि जो लोग ख़ुदा पर भरोसा रखते हैं ख़ुदा उनको ज़रूर दोस्त रखता है

यह क़िस्सा केवल क़ुरआन से लिया गया है। दूसरी किताबों की तफ़सीलें नहीं जोड़ी गईं।

अरबी पाठ: उस्मानी लिपि। अनुवाद: Suhel Farooq Khan and Saifur Rahman Nadwi।

नबियों के बारे में सवाल

नबी Muhammad कौन थे?

क़ुरआन में मुहम्मद ﷺ का नाम चार बार आया है (3:144, 33:40, 47:2 और 48:29)। यह पन्ना उन आयतों में से कुछ को इकट्ठा करता है जो उनसे और उनके बारे में बात करती हैं।

क़ुरआन में Muhammad का क़िस्सा कहाँ है?

यह Al-Ahzab 33:40, Al-Ahzab 33:45–46, Al-Anbiya 21:107, Ad-Duha 93:1–11, Ash-Sharh 94:1–8, At-Tawbah 9:128–129, Ali 'Imran 3:159 में है। यह पन्ना इन आयतों को अरबी में और आपकी भाषा में दिखाता है।

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