नमाज़ के बाद के अज़कार

8 अज़कार

प्रगति

नमाज़ पूरी करने के बाद क्या पढ़ें

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((أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ (ثَلاَثَاً) اللَّهُمَّ أَنْتَ السَّلاَمُ، وَمِنْكَ السَّلاَمُ، تَبَارَكْتَ يَا ذَا الْجَلاَلِ وَالْإِكْرَامِ)).

(मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ।(तीन बार) (ऐ अल्लाह! तू अस-सलाम है और तुझी से सारी सलामती है, तू बड़ा बरकत वाला है, ऐ अज़मत और इकराम वाले!) (अस-सलाम: वह जो हर ऐब और कमी से पाक है।))

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((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ [ثلاثاً]، اللَّهُمَّ لاَ مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلاَ مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلاَ يَنْفَعُ ذَا الْجَدِّ مِنْكَ الجَدُّ)).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।ऐ अल्लाह! जो तू देना चाहे उसे कोई रोकने वाला नहीं और जो तू रोक दे उसे कोई देने वाला नहीं, और किसी दौलत वाले या बड़ाई वाले को तेरे मुक़ाबले में उसकी दौलत या बड़ाई कोई फ़ायदा नहीं देती, क्योंकि सारी दौलत और बड़ाई तुझी से है।)

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((لَا إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ، وَلَهُ الْحَمدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ. لاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَلاَ نَعْبُدُ إِلاَّ إِيَّاهُ, لَهُ النِّعْمَةُ وَلَهُ الْفَضْلُ وَلَهُ الثَّنَاءُ الْحَسَنُ، لَا إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الكَافِرُونَ)).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है और न कोई शक्ति, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और हम उसके सिवा किसी की इबादत नहीं करते। उसी के लिए सारी नेमत, फ़ज़ल और उत्तम प्रशंसा है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, हम दीन को उसी के लिए ख़ालिस करते हैं, चाहे काफ़िरों को यह नागवार ही क्यों न गुज़रे।)

4 33 बार दोहराएँ

((سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ (ثلاثاً وثلاثين) لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ)).

(अल्लाह पाक है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है और अल्लाह सबसे बड़ा है।(तैंतीस बार) (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।))

5 एक बार पढ़ें

بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ اللَّهُ الصَّمَدُ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُواً أَحَدٌ﴾، بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾،بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ مَلِكِ النَّاسِ إِلَهِ النَّاسِ مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ مِنَ الْجِنَّةِ وَ النَّاسِ﴾ بَعْدَ كُلِّ صَلاَةٍ.

ज़ुहर, अस्र और इशा की नमाज़ के बाद नीचे की तीन सूरतें एक-एक बार और फ़ज्र और मग़रिब की नमाज़ के बाद तीन-तीन बार पढ़ी जाएँ।[सूरह अल-इख़लास (112)] [सूरह अल-फ़लक़ (113)] [सूरह अन-नास (114)]

6 एक बार पढ़ें

﴿اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ﴾ عَقِبَ كلِّ صَلاَةٍ.

हर नमाज़ के बाद आयतुल-कुर्सी पढ़ना भी सुन्नत है:[सूरह अल-बक़रह, आयत 255]

7 10 बार दोहराएँ

((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ)) عَشْرَ مَرّاتٍ بَعْدَ صَلاةِ الْمَغْرِبِ وَالصُّبْحِ.

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है, वही जिलाता और मारता है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।(मग़रिब और फ़ज्र की नमाज़ के बाद दस बार))

8 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْماً نافِعاً، وَرِزْقاً طَيِّباً، وَعَمَلاً مُتَقَبَّلاً)) بَعْدَ السّلامِ مِنْ صَلاَةِ الفَجْرِ.

(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभदायक इल्म, पाकीज़ा रोज़ी और क़ुबूल होने वाले अमल का सवाल करता हूँ।)(फ़ज्र की नमाज़ में सलाम फेरने के बाद पढ़ी जाए)

हर फ़र्ज़ नमाज़ के सलाम के ठीक बाद पढ़ा जाने वाला ज़िक्र।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"नमाज़ के बाद के अज़कार" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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