सोने से पहले और जागने पर की दुआएँ

17 अज़कार

प्रगति

सोने से पहले क्या पढ़ें

1 3 बार दोहराएँ

((يَجْمَعُ كَفَّيْهِ ثُمَّ يَنْفُثُ فِيهِمَا فَيَقْرَأُ فِيهِمَا:بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ اللَّهُ الصَّمَدُ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُواً أَحَدٌ﴾. بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾. بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ مَلِكِ النَّاسِ إِلَهِ النَّاسِ مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ مِنَ الْجِنَّةِ وَ النَّاسِ﴾ ثُمَّ يَمْسَحُ بِهِمَا مَا اسْتَطَاعَ مِنْ جَسَدِهِ يَبْدَأُ بِهِمَا عَلَى رَأْسِهِ وَوَجْهِهِ وَمَا أَقبَلَ مِنْ جَسَدِهِ)) (يفعلُ ذلك ثلاثَ مرَّاتٍ).

(हर रात जब नबी ﷺ अपने बिस्तर पर आते तो अपनी दोनों हथेलियाँ मिलाते, उनमें फूँक मारते (एक प्रकार की फूँक जिसमें मुख्यतः हवा होती है और थूक बहुत कम), क़ुरआन की आख़िरी तीन सूरतें (अल-इख़लास, अल-फ़लक़, अन-नास) पढ़ते और फिर अपने हाथों से जहाँ तक संभव होता पूरे जिस्म पर फेरते, सिर और चेहरे से शुरू करके फिर जिस्म के सारे हिस्सों पर। वे ऐसा तीन बार करते।)

2 एक बार पढ़ें

﴿اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْـــــــــــدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ﴾.

अल्लाह, उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह हमेशा ज़िंदा है, सारी कायनात को संभालने वाला है। उसे न ऊँघ आती है और न नींद। उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बिना उसके पास सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो उनके सामने [अभी] है और जो उनके बाद होगा, और वे उसके इल्म में से किसी चीज़ का भी घेराव नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी आसमानों और ज़मीन पर फैली हुई है और उनकी हिफ़ाज़त उसे थकाती नहीं। और वही सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा है।

3 एक बार पढ़ें

﴿آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلآئِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لاَ نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ وَقَالُواْ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ لاَ يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلاَّ وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لاَ تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلاَ تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْراً كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلاَ تُحَمِّلْنَا مَا لاَ طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَآ أَنتَ مَوْلاَنَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ﴾.

( 285 ) रसूल उस पर ईमान लाए जो उनके रब की ओर से उन पर उतारा गया, और मोमिन भी। सब अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाए, [यह कहते हुए कि] हम उसके रसूलों में से किसी के बीच फ़र्क़ नहीं करते। और उन्होंने कहा: हमने सुना और मान लिया। [हम] तेरी माफ़ी [चाहते हैं], ऐ हमारे रब, और तेरी ही ओर [अंतिम] लौटना है।( 286 ) अल्लाह किसी जान पर उसकी सामर्थ्य से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। उसे उसका [फल] मिलेगा जो [नेकी] उसने कमाई और उस पर उसका [वबाल] पड़ेगा जो [बुराई] उसने कमाई। ऐ हमारे रब! अगर हम भूल जाएँ या चूक जाएँ तो हमारी पकड़ न कर। ऐ हमारे रब! और हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले वालों पर डाला था। ऐ हमारे रब! और हम पर वह बोझ न डाल जिसे उठाने की हममें ताक़त नहीं। और हमें माफ़ कर दे, हमारी मग़फ़िरत फ़रमा और हम पर रहम कर। तू ही हमारा मालिक है, इसलिए इनकार करने वाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा।

4 एक बार पढ़ें

((بِاسْمِكَ رَبِّي وَضَعْتُ جَنْبِي، وَبِكَ أَرْفَعُهُ، فَإِن أَمْسَكْتَ نَفْسِي فارْحَمْهَا، وَإِنْ أَرْسَلْتَهَا فَاحْفَظْهَا، بِمَا تَحْفَظُ بِهِ عِبَادَكَ الصَّالِحِينَ)).

(ऐ मेरे रब! तेरे नाम से मैं लेटता हूँ और तेरे ही नाम से उठूँगा, तो अगर तू मेरी जान रोक ले तो उस पर रहम फ़रमा और अगर तू उसे लौटा दे तो उसकी वैसे हिफ़ाज़त फ़रमा जैसे तू अपने नेक बंदों की करता है।)

5 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ إِنَّكَ خَلَقْتَ نَفْسِي وَأَنْتَ تَوَفَّاهَا، لَكَ مَمَاتُهَا وَمَحْياهَا، إِنْ أَحْيَيْتَهَا فَاحْفَظْهَا، وَإِنْ أَمَتَّهَا فَاغْفِرْ لَهَا. اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ العَافِيَةَ)).

(ऐ अल्लाह! बेशक तूने मेरी जान को पैदा किया और तू ही उसे वफ़ात देगा, उसकी ज़िंदगी और मौत तेरे ही लिए है। अगर तू उसे ज़िंदा रखे तो उसकी हिफ़ाज़त फ़रमा और अगर तू उसे वफ़ात दे तो उसे माफ़ कर दे। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे आफ़ियत का सवाल करता हूँ।)

6 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ قِنِي عَذَابَكَ يَوْمَ تَبْعَثُ عِبَادَكَ)).

(ऐ अल्लाह! मुझे अपने उस अज़ाब से बचा लेना जिस दिन तू अपने बंदों को दोबारा उठाएगा।)

7 एक बार पढ़ें

((بِاسْمِكَ اللَّهُمَّ أَمُوتُ وَأَحْيَا)).

(ऐ अल्लाह! तेरे नाम से मैं जीता हूँ और मरता हूँ।)

8 एक बार पढ़ें

((سُبْحَانَ اللَّهِ (ثلاثاً وثلاثين) وَالْحَمْدُ لِلَّهِ (ثلاثاً وثلاثين) وَاللَّهُ أَكْبَرُ (أربعاً وثلاثينَ))).

(अल्लाह पाक है। (तैंतीस बार) सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है।(तैंतीस बार) अल्लाह सबसे बड़ा है।(चौंतीस बार))

9 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ وَرَبَّ الأَرْضِ، وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ، رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ، فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى، وَمُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ، وَالْفُرْقَانِ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ. اللَّهُمَّ أَنْتَ الأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الآخِرُ فَلَيسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ، وَأَنْتَ الْبَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ، اقْضِ عَنَّا الدَّيْنَ وَأَغْنِنَا مِنَ الْفَقْرِ)).

(ऐ अल्लाह! सातों आसमानों के रब और अज़ीम अर्श के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने और गुठली को फाड़ने वाले, तौरात, इंजील और फ़ुरक़ान उतारने वाले! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ हर उस चीज़ की बुराई से जिसकी चोटी तू पकड़े हुए है (यानी जिस पर तेरा पूरा इख़्तियार है)। ऐ अल्लाह! तू ही अव्वल है, तुझसे पहले कुछ नहीं और तू ही आख़िर है, तेरे बाद कुछ नहीं।तू ही ज़ाहिर है, तुझसे ऊपर कुछ नहीं और तू ही बातिन है, तुझसे ज़्यादा क़रीब कुछ नहीं।हमारी ओर से हमारा क़र्ज़ चुका दे और हमें मोहताजी से बचा ले।)(तौरात: वह किताब जो मूसा अलैहिस्सलाम पर उतारी गई।)(इंजील: वह किताब जो ईसा अलैहिस्सलाम पर उतारी गई।)(फ़ुरक़ान: क़ुरआन के अनेक नामों में से एक, जिसका अर्थ है: वह कसौटी जो हक़ और बातिल में फ़र्क़ करती है।)(अज़-ज़ाहिर: उसकी सिफ़ात की अज़मत और उसकी बड़ाई और बुलंदी के सामने हर मख़लूक़ के तुच्छ होने को दर्शाता है, क्योंकि वह अपनी ज़ात और सिफ़ात के लिहाज़ से अपनी सारी मख़लूक़ से ऊपर है।)(अल-बातिन: सारे भेदों, दिलों में जो कुछ है और सबसे गुप्त बातों के बारे में उसकी ख़बर और इल्म को दर्शाता है, साथ ही यह भी कि वह अपनी शान के मुताबिक़ सबके निकट और क़रीब है।)

10 एक बार पढ़ें

((الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا، وَكَفَانَا، وَآوَانَا، فَكَمْ مِمَّنْ لاَ كَافِيَ لَهُ وَلاَ مُؤْوِيَ)).

(सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें खिलाया और पिलाया, जो हमारे लिए काफ़ी हुआ और जिसने हमें ठिकाना दिया, क्योंकि कितने ही लोग ऐसे हैं जिनका न कोई काफ़ी होने वाला है और न ठिकाना देने वाला।)

11 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءاً، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ)).

(ऐ अल्लाह! ग़ैब और हाज़िर के जानने वाले, आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, हर चीज़ के रब और मालिक! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं तेरी पनाह माँगता हूँ अपने नफ़्स की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से, और इससे कि मैं अपनी जान पर कोई ज़ुल्म करूँ या किसी दूसरे मुसलमान पर ऐसा कुछ लाऊँ।)(शिर्क: उन चीज़ों में, जो अल्लाह के लिए ख़ास हैं, दूसरों को अल्लाह का साझीदार ठहराना। यह (1) अक़ीदे में हो सकता है, जैसे यह मानना कि अल्लाह के सिवा कोई फ़ायदा या नुक़सान पहुँचा सकता है, (2) बात में, जैसे अल्लाह के सिवा किसी की क़सम खाना और (3) अमल में, जैसे अल्लाह के सिवा किसी के आगे झुकना या सज्दा करना।)

12 एक बार पढ़ें

((يَقْرَأُ ﴿الم﴾ تَنْزِيلَ السَّجْدَة ِ، وَتَبَارَكَ الَّذي بِيَدِهِ الْمُلْكُ)).

(नबी ﷺ उस समय तक नहीं सोते थे जब तक सूरह अस-सजदा (अध्याय 32) और सूरह अल-मुल्क (अध्याय 67) न पढ़ लेते।)

13 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ أَسْلَمْتُ نَفْسِي إِلَيْكَ، وَفَوَّضْتُ أَمْرِي إِلَيْكَ، وَوَجَّهْتُ وَجْهِي إِلَيْكَ، وَأَلْجَأْتُ ظَهْرِي إِلَيْكَ، رَغْبَةً وَرَهْبَةً إِلَيْكَ، لاَ مَلْجَأَ وَلاَ مَنْجَا مِنْكَ إِلاَّ إِلَيْكَ، آمَنْتُ بِكِتَابِكَ الَّذِي أَنْزَلْتَ، وَبِنَبِيِّكَ الَّذِي أَرْسَلْتَ)).

(ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान तेरे हवाले कर दी, अपना मामला तेरे सुपुर्द कर दिया, अपना रुख़ तेरी ओर कर लिया और तेरी उम्मीद और तेरे डर के साथ पूरी तरह तुझ पर भरोसा किया।बेशक तुझसे बचने का कोई ठिकाना और कोई पनाह नहीं सिवाय तेरे ही पास। मैं तेरी उस किताब पर ईमान लाया जो तूने उतारी और तेरे उस नबी पर जिसे तूने भेजा।)(अगर तुम उसी रात मर गए, तो फ़ितरत पर मरोगे।)(फ़ितरत: इस्लाम का दीन, इब्राहीम अलैहिस्सलाम का तरीक़ा।)

जागने पर की दुआएँ

1 एक बार पढ़ें

(.الْحَمْدُ للَّهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا أَمَاتَنَا، وَإِلَيْهِ النُّشُورُ )

(सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने हमें मौत देने के बाद ज़िंदगी दी और उसी की ओर दोबारा उठकर जाना है।)

2 एक बार पढ़ें

لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَريكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ للَّهِ، وَلاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكبَرُ، وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ، رَبِّ اغْفرْ لِي

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर पूरी तरह क़ादिर है। अल्लाह पाक है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, अल्लाह सबसे बड़ा है और अल्लाह के सिवा, जो सबसे बुलंद और सबसे अज़ीम है, न कोई ताक़त है और न कोई शक्ति।ऐ मेरे रब! मुझे माफ़ कर दे)

3 एक बार पढ़ें

( الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي عَافَانِي فِي جَسَدِي، وَرَدَّ عَلَيَّ رُوحِي، وَأَذِنَ لي بِذِكْرِهِ )

(सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे मेरी आफ़ियत लौटा दी, मेरी रूह मुझे वापस कर दी और मुझे अपना ज़िक्र करने की इजाज़त दी।)

4 एक बार पढ़ें

﴿ إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَاخْتِلاَفِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لأُوْلِي الألْبَابِ الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَاماً وَقُعُوداً وَعَلَىَ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَذا بَاطِلاً سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ رَبَّنَا إِنَّكَ مَن تُدْخِلِ النَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ رَّبَّنَا إِنَّنَا سَمِعْنَا مُنَادِياً يُنَادِي لِلإِيمَانِ أَنْ آمِنُواْ بِرَبِّكُمْ فَآمَنَّا رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الأبْرَارِ رَبَّنَا وَآتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَى رُسُلِكَ وَلاَ تُخْزِنَا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّكَ لاَ تُخْلِفُ الْمِيعَادَ فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ أَنِّي لاَ أُضِيعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَى بَعْضُكُم مِّن بَعْضٍ فَالَّذِينَ هَاجَرُواْ وَأُخْرِجُواْ مِن دِيَارِهِمْ وَأُوذُواْ فِي سَبِيلِي وَقَاتَلُواْ وَقُتِلُواْ لأُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلأُدْخِلَنَّهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الأَنْهَارُ ثَوَاباً مِّن عِندِ اللَّهِ وَاللَّهُ عِندَهُ حُسْنُ الثَّوَابِ لاَ يَغُرَّنَّكَ تَقَلُّبُ الَّذِينَ كَفَرُواْ فِي الْبِلاَدِ مَتَاعٌ قَلِيلٌ ثُمَّ مَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ وَبِئْسَ الْمِهَادُ لَكِنِ الَّذِينَ اتَّقَوْاْ رَبَّهُمْ لَهُمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا نُزُلاً مِّنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ لِّلأَبْرَارِ وَإِنَّ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَمَن يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِمْ خَاشِعِينَ لِلَّهِ لاَ يَشْتَرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ ثَمَناً قَلِيلاً أُوْلَئِكَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اصْبِرُواْ وَصَابِرُواْ وَرَابِطُواْ وَاتَّقُواْ اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ﴾

( 190 ) बेशक आसमानों और ज़मीन की पैदाइश में और रात और दिन के आने-जाने में अक़्लमंदों के लिए निशानियाँ हैं।( 191 ) जो खड़े, बैठे और [लेटे] अपनी करवटों पर अल्लाह को याद करते हैं और आसमानों और ज़मीन की पैदाइश पर ग़ौर करते हैं, [यह कहते हुए], ऐ हमारे रब! तूने यह बेकार नहीं पैदा किया; तू [ऐसी बात से] पाक है; तो हमें आग के अज़ाब से बचा ले।( 192 ) ऐ हमारे रब! बेशक तू जिसे आग में डाल दे उसे तूने रुसवा कर दिया, और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं।( 193 ) ऐ हमारे रब! बेशक हमने एक पुकारने वाले को सुना जो ईमान की ओर बुला रहा था, [यह कहते हुए], ‘अपने रब पर ईमान लाओ’, तो हम ईमान ले आए। ऐ हमारे रब! तो हमारे गुनाह माफ़ कर दे, हमारी बुराइयाँ हमसे दूर कर दे और हमें नेक लोगों के साथ मौत दे।( 194 ) ऐ हमारे रब! और हमें वह अता कर जिसका तूने अपने रसूलों के ज़रिए हमसे वादा किया और क़ियामत के दिन हमें रुसवा न कर। बेशक तू [अपने] वादे के ख़िलाफ़ नहीं करता।( 195 ) तो उनके रब ने उनकी दुआ क़ुबूल की, कि मैं तुममें से किसी अमल करने वाले का अमल, चाहे वह मर्द हो या औरत, हरगिज़ ज़ाया नहीं करूँगा; तुम एक-दूसरे से हो। तो जिन्होंने हिजरत की या अपने घरों से निकाले गए या मेरी राह में सताए गए या लड़े या मारे गए - मैं ज़रूर उनकी बुराइयाँ उनसे दूर कर दूँगा और ज़रूर उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं, यह अल्लाह की ओर से बदला है, और अल्लाह के पास सबसे अच्छा बदला है।( 196 ) इनकार करने वालों का देश भर में [बेरोक-टोक] चलना-फिरना तुम्हें धोखे में न डाले।( 197 ) [यह तो बस] थोड़ा-सा फ़ायदा है; फिर उनका [अंतिम] ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत बुरा ठिकाना है।( 198 ) लेकिन जो अपने रब से डरे उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती हैं, वे उनमें हमेशा रहेंगे, यह अल्लाह की ओर से मेहमानी है। और जो अल्लाह के पास है वही नेक लोगों के लिए सबसे अच्छा है।( 199 ) और बेशक किताब वालों में कुछ ऐसे भी हैं जो अल्लाह पर और उस पर जो तुम पर उतारा गया और उस पर जो उन पर उतारा गया ईमान रखते हैं, [और] अल्लाह के आगे विनम्र हैं। वे अल्लाह की आयतों को थोड़े मोल पर नहीं बेचते।उनके लिए उनके रब के पास उनका बदला है। बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है।( 200 ) ऐ ईमान वालो! सब्र करो, डटे रहो, [सरहदों पर] तैनात रहो और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम कामयाब हो।

अपने दिन की शुरुआत और अंत अल्लाह के ज़िक्र से करें: सोने से पहले और जागने पर क्या पढ़ें।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"सोने से पहले और जागने पर की दुआएँ" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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