सुबह और शाम के अज़कार

24 अज़कार

प्रगति
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أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيطَانِ الرَّجِيمِ ﴿اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ﴾.

अल्लाह, उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह हमेशा ज़िंदा है, सारी कायनात को संभालने वाला है। उसे न ऊँघ आती है और न नींद। उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बिना उसके पास सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो उनके सामने [अभी] है और जो उनके बाद होगा, और वे उसके इल्म में से किसी चीज़ का भी घेराव नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी आसमानों और ज़मीन पर फैली हुई है और उनकी हिफ़ाज़त उसे थकाती नहीं। और वही सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा है।

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(بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ اللَّهُ الصَّمَدُ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُواً أَحَدٌ﴾.) (بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ﴾.) (بسم الله الرحمن الرحيم ﴿قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ مَلِكِ النَّاسِ إِلَهِ النَّاسِ مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ مِنَ الْجِنَّةِ وَ النَّاسِ﴾)

([सूरह अल-इख़लास (112)]( 1 ) कहो, वह अल्लाह [जो] एक है,( 2 ) अल्लाह बेनियाज़ है,( 3 ) न उसकी कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है,( 4 ) और न कोई उसके बराबर है।)([सूरह अल-फ़लक़ (113)] ( 1 ) कहो, मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ( 2 ) हर उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की( 3 ) और अँधेरे की बुराई से जब वह छा जाए( 4 ) और गिरहों में फूँकने वालों की बुराई से( 5 ) और हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे। )([सूरह अन-नास (114)])( 1 ) कहो, मैं लोगों के रब की पनाह माँगता हूँ,( 2 ) लोगों के बादशाह की,( 3 ) लोगों के माबूद की,( 4 ) पीछे हट जाने वाले वसवसा डालने वाले की बुराई से -( 5 ) जो लोगों के सीनों में [बुरे] वसवसे डालता है -( 6 ) चाहे वह जिन्नों में से हो या इंसानों में से।

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((أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ الْمُلْكُ لِلَّهِ ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، لاَ إِلَهَ إلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذَا الْيَوْمِ وَخَيرَ مَا بَعْدَهُ ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِي هَذَا الْيَوْمِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسُوءِ الْكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي الْقَبْرِ)). [ وإذا أمسى قال: أمسينا وأمسى الملك للَّه] [وإذا أمسى قال: رب أسألك خير ما في هذه الليلة، وخير ما بعدها، وأعوذ بك من شر ما في هذه الليلة، وشر ما بعدها.]

‘हमने सुबह की और इसी समय अल्लाह ही की बादशाही है और सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। ऐ मेरे रब! मैं तुझसे इस दिन की भलाई और इसके बाद आने वाले की भलाई का सवाल करता हूँ और इस दिन की बुराई और इसके बाद आने वाले की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। ऐ मेरे रब! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ सुस्ती और बुढ़ापे की कमज़ोरी से। ऐ मेरे रब! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ जहन्नम की आग के अज़ाब और क़ब्र के अज़ाब से।’

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((اللَّهُمَّ بِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ أَمْسَيْنَا ، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ النُّشُورُ)). [وإذا أمسى قال: اللَّهم بك أمسينا، وبك أصبحنا، وبك نحيا، وبك نموت، وإليك المصير.]

(ऐ अल्लाह! तेरे ही हुक्म से हमने सुबह की और तेरे ही हुक्म से हमने शाम की, तेरे ही हुक्म से हम जीते और मरते हैं और तेरी ही ओर हमारा दोबारा उठाया जाना है।)[शाम को:](ऐ अल्लाह! तेरे ही हुक्म से हमने शाम की और तेरे ही हुक्म से हमने सुबह की, तेरे ही हुक्म से हम जीते और मरते हैं और तेरी ही ओर हमारा लौटना है।)

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((اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ)).

(ऐ अल्लाह! तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ और मैं अपनी सामर्थ्य भर तेरे अहद और वादे पर क़ायम हूँ, मैं अपने किए की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमत का इक़रार करता हूँ और अपने गुनाह का इक़रार करता हूँ, इसलिए मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि बेशक तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।)

6 4 बार दोहराएँ

((اللَّهُمَّ إِنِّي أَصْبَحْتُ أُشْهِدُكَ، وَأُشْهِدُ حَمَلَةَ عَرْشِكَ، وَمَلاَئِكَتِكَ، وَجَمِيعَ خَلْقِكَ، أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، وَأَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُكَ وَرَسُولُكَ)) (أربعَ مَرَّاتٍ).[ وإذا أمسى قال: اللَّهم إني أمسيت...]

(ऐ अल्लाह! बेशक मैंने सुबह की और मैं तुझे, तेरे अर्श को उठाने वालों को, तेरे फ़रिश्तों को और तेरी सारी मख़लूक़ को गवाह बनाता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई साझीदार नहीं और यह कि मुहम्मद तेरे बंदे और रसूल हैं।) (सुबह और शाम चार बार)(नोट: शाम को (अस्बह्तु) की जगह (अमसैतु) पढ़ा जाए।)

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((اللَّهُمَّ مَا أَصْبَحَ بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ)). [وإذا أمسى قال: اللَّهم ما أمسى بي...]

(ऐ अल्लाह! जो भी नेमत मुझ पर या तेरी किसी भी मख़लूक़ पर सुबह को आई है, वह अकेले तेरी ही ओर से है, तेरा कोई साझीदार नहीं, इसलिए तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है।)(…जो इसे सुबह कहे उसने अपने दिन का शुक्र अदा कर दिया और जो इसे शाम को कहे उसने अपनी रात का शुक्र अदा कर दिया।)(नोट: शाम को (अस्बह) की जगह (अमसा) पढ़ा जाए।)

8 3 बार दोहराएँ

((اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَدَنِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي سَمْعِي، اللَّهُمَّ عَافِنِي فِي بَصَرِي، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ. اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكُفْرِ، وَالفَقْرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ).

(ऐ अल्लाह! मेरे जिस्म को आफ़ियत दे, ऐ अल्लाह! मेरे कानों को आफ़ियत दे, ऐ अल्लाह! मेरी आँखों को आफ़ियत दे। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)(तीन बार) (ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ कुफ़्र और मोहताजी से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ क़ब्र के अज़ाब से। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। (तीन बार))

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((حَسْبِيَ اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ عَلَيهِ تَوَكَّلتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ)) (سَبْعَ مَرّاتٍ).

मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, मैंने उसी पर भरोसा किया और वह अज़ीम अर्श का रब है।’ (अरबी में सात बार पढ़ें।)

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((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ: فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي، وَمَالِي، اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي، وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللَّهُمَّ احْفَظْنِي مِنْ بَينِ يَدَيَّ، وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي، وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي)).

ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में माफ़ी और आफ़ियत का सवाल करता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने दीन और दुनिया के मामलों में, अपने घर वालों और अपने माल में माफ़ी और आफ़ियत का सवाल करता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरी कमज़ोरियों पर पर्दा डाल दे और मेरी घबराहट को सुकून में बदल दे। ऐ अल्लाह! मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा आगे से और पीछे से, दाएँ से और बाएँ से और ऊपर से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इससे कि मैं नीचे से ज़मीन में धँसा दिया जाऊँ।

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((اللَّهُمَّ عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطانِ وَشَرَكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءاً، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ)).

(ऐ अल्लाह! ग़ैब और ज़ाहिर के जानने वाले, आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, हर चीज़ के रब और मालिक! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं तेरी पनाह माँगता हूँ अपने नफ़्स की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से, और इससे कि मैं अपनी जान पर कोई ज़ुल्म करूँ या किसी दूसरे मुसलमान पर ऐसा कुछ लाऊँ।)(शिर्क: उन चीज़ों में, जो अल्लाह के लिए ख़ास हैं, दूसरों को अल्लाह का साझीदार ठहराना। यह (1) अक़ीदे में हो सकता है, जैसे यह मानना कि अल्लाह के सिवा कोई फ़ायदा या नुक़सान पहुँचा सकता है, (2) बात में, जैसे अल्लाह के सिवा किसी की क़सम खाना और (3) अमल में, जैसे अल्लाह के सिवा किसी के आगे झुकना या सज्दा करना।)

12 3 बार दोहराएँ

((بِسْمِ اللَّهِ الَّذِي لاَ يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلاَ فِي السّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ).

(अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ ज़मीन और आसमानों में कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती और वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।’(तीन बार))

13 3 बार दोहराएँ

((رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبَّاً، وَبِالْإِسْلاَمِ دِيناً، وَبِمُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم نَبِيّاً)) (ثلاثَ مرَّاتٍ).

(मैं अल्लाह के रब होने, इस्लाम के दीन होने और मुहम्मद के नबी होने पर राज़ी हूँ।’(तीन बार))

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((يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغيثُ أَصْلِحْ لِي شَأْنِيَ كُلَّهُ وَلاَ تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ)).

(ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले! ऐ सबको क़ायम रखने और संभालने वाले! तेरी रहमत के वास्ते से मैं मदद चाहता हूँ, मेरे सारे मामले सँवार दे और मुझे पलक झपकने भर के लिए भी मेरे हाल पर न छोड़।)

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((أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ الْمُلْكُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، اللَّهُـمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ هَذَا الْيَوْمِ:فَتْحَهُ، وَنَصْرَهُ، وَنورَهُ، وَبَرَكَتَهُ، وَهُدَاهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِيهِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ)). [وإذا أمسى قال: أمسينا وأمسى الملك للَّه ربّ العالمين اللَّهم إني أسألك خير هذه الليلة: فتحها، ونصرها، ونورها، وبركتها، وهداها، وأعوذ بك من شر ما فيها، وشر ما بعدها.]

(हमने सुबह की और इसी समय सारी बादशाही अल्लाह की है, जो सारे जहानों का रब है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस दिन की भलाई का सवाल करता हूँ, इसकी फ़तहों और कामयाबियों का, इसके नूर और बरकतों का और इसकी हिदायत का, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इस दिन की बुराई से और उस बुराई से जो इसके बाद आए।)[शाम को यह दुआ इस तरह पढ़ी जाए:](हमने शाम की और इसी समय सारी बादशाही अल्लाह की है, जो सारे जहानों का रब है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस रात की भलाई का सवाल करता हूँ, इसकी फ़तहों और कामयाबियों का, इसके नूर और बरकतों का और इसकी हिदायत का, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इस रात की बुराई से और उस बुराई से जो इसके बाद आए।)

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((أَصْبَحْنا عَلَى فِطْرَةِ الْإِسْلاَمِ، وَعَلَى كَلِمَةِ الْإِخْلاَصِ، وَعَلَى دِينِ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم، وَعَلَى مِلَّةِ أَبِينَا إِبْرَاهِيمَ، حَنِيفاً مُسْلِماً وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشرِكِينَ)). [وإذا أمسى قال: أمسينا على فطرة الإسلام...]

(हमने इस्लाम की फ़ितरत पर, ख़ालिस ईमान के कलिमे पर, अपने नबी मुहम्मद के दीन पर और अपने बाप इब्राहीम के दीन पर सुबह की, जो एक सच्चे मुसलमान और सीधे रास्ते वाले थे और शिर्क करने वालों में से नहीं थे।)(फ़ितरत: इस्लाम का दीन, इब्राहीम अलैहिस्सलाम का तरीक़ा।)(नोट: शाम को (अस्बह्ना) की जगह (अमसैना) पढ़ा जाए।)

17 100 बार दोहराएँ

((سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ)) (مائة مرَّةٍ).

(अल्लाह पाक है और मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ।)(सौ बार)

18 10 बार दोहराएँ

((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ)) (عشرَ مرَّات) ، أَوْ (مرَّةً واحدةً عندَ الكَسَلِ).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।)( [दस बार, या सुस्ती हो तो एक बार])

19 100 बार दोहराएँ

((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ)) (مائةَ مرَّةٍ إذا أصبحَ).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।)((हर दिन सौ बार))

20 3 बार दोहराएँ

((سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ: عَدَدَ خَلْقِهِ، وَرِضَا نَفْسِهِ، وَزِنَةَ عَرْشِهِ، وَمِدَادَ كَلِمَاتِهِ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ إذا أصبحَ).

(अल्लाह पाक है और मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ, उसकी मख़लूक़ की गिनती के बराबर, उसकी रज़ा के बराबर, उसके अर्श के वज़न के बराबर और उसके कलिमात की स्याही के बराबर।)(तीन बार)

21 एक बार पढ़ें

((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْماً نَافِعاً، وَرِزْقاً طَيِّباً، وَعَمَلاً مُتَقَبَّلاً)) (إذا أصبحَ).

(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभदायक इल्म, पाकीज़ा रोज़ी और क़ुबूल होने वाले अमल का सवाल करता हूँ।)

22 100 बार दोहराएँ

((أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ)) (مِائَةَ مَرَّةٍ فِي الْيَوْمِ).

‘मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ और उसकी ओर तौबा करता हूँ।’ [दिन में सौ बार]

23 3 बार दोहराएँ

((أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ)) (ثلاثَ مرَّاتٍ إذا أمسى).

(मैं अल्लाह के पूरे कलिमात की पनाह माँगता हूँ उसकी पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से।)(शाम को तीन बार)

24 10 बार दोहराएँ

((اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ عَلَى نَبَيِّنَا مُحَمَّدٍ)) (عشرَ مرَّاتٍ).

‘ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुहम्मद पर दुरूद और सलाम भेज।’ [दस बार]

ये अज़कार फ़ज्र के बाद (सुबह) और अस्र के बाद या शाम की शुरुआत में पढ़े जाते हैं। इनमें से कई एक से ज़्यादा बार पढ़े जाते हैं, इसलिए हर एक के लिए काउंटर दिखाया जाता है।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"सुबह और शाम के अज़कार" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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