चिंता, कष्ट, डर, ग़ुस्से और क़र्ज़ की दुआएँ

10 अज़कार

प्रगति

फ़िक्र और ग़म के समय की दुआएँ

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((اللَّهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ، ابْنُ عَبْدِكَ، ابْنُ أَمَتِكَ، نَاصِيَتِي بِيَدِكَ، مَاضٍ فِيَّ حُكْمُكَ، عَدْلٌ فِيَّ قَضَاؤُكَ، أَسْأَلُكَ بِكُــــلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ، سَمَّيْتَ بِهِ نَفْسَكَ، أَوْ أَنْزَلْتَهُ فِي كِتَابِكَ، أَوْ عَلَّمْتَهُ أَحَداً مِنْ خَلْقِكَ، أَوِ اسْتَأْثَرْتَ بِهِ فِي عِلْمِ الغَيْبِ عِنْدَكَ، أَنْ تَجْعَلَ القُرْآنَ رَبِيعَ قَلْبِي، وَنُورَ صَدْرِي، وَجَلاَءَ حُزْنِي، وَذَهَابَ هَمِّي)).

(ऐ अल्लाह! मैं तेरा बंदा हूँ, तेरे बंदे का बेटा हूँ, तेरी बाँदी का बेटा हूँ, मेरी चोटी तेरे हाथ में है (यानी तुझे मुझ पर पूरा इख़्तियार है), मुझ पर तेरा हुक्म हमेशा चलने वाला है और मेरे बारे में तेरा फ़ैसला इंसाफ़ पर आधारित है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम के वास्ते से सवाल करता हूँ जो तेरा है, जिससे तूने अपने आपको नामित किया, या जिसे तूने अपनी किताब में उतारा, या अपनी मख़लूक़ में से किसी को सिखाया, या जिसे तूने अपने पास ग़ैब के इल्म में महफ़ूज़ रखा, कि तू क़ुरआन को मेरे दिल की बहार और मेरे सीने का नूर बना दे, और मेरे ग़म को दूर करने वाला और मेरी फ़िक्र को मिटाने वाला बना दे।)

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((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ)).

(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, क़र्ज़ के बोझ से और लोगों के ग़ालिब आ जाने से।)

कष्ट के समय की दुआएँ

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((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ الْعَظِيمُ الْحَلِيمُ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ رَبُّ السَّمَوَاتِ وَرَبُّ الْأَرْضِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيمِ)).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो बड़ा सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो अज़ीम अर्श का रब है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो आसमानों का रब, ज़मीन का रब और करीम अर्श का रब है।)

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((اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو، فَلاَ تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ، وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ)).

(ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही रहमत की उम्मीद रखता हूँ, इसलिए मुझे पलक झपकने भर के लिए भी मेरे हाल पर न छोड़ और मेरे सारे मामले सँवार दे।तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)

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((لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظّالِمِينَ)).

(तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तू पाक है, बेशक मैं ज़ालिमों में से था।)

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((اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي لاَ أُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً)).

(अल्लाह, अल्लाह ही मेरा रब है, मैं उसके साथ किसी चीज़ को साझीदार नहीं ठहराता।)

डर लगे तो क्या पढ़ें

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((لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ!)).

(अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)

ग़ुस्से की दुआ

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((أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ)).

(मैं मरदूद शैतान से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ।)

क़र्ज़ चुकाने की दुआएँ

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((اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلاَلِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكِ عَمَّنْ سِوَاكَ)).

(ऐ अल्लाह! मुझे हराम से बचाकर हलाल ही पर काफ़ी बना दे और अपने फ़ज़ल से मुझे अपने सिवा दूसरों से बेनियाज़ कर दे।)

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((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ)).

(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, क़र्ज़ के बोझ से और लोगों के ग़ालिब आ जाने से।)

जब ज़िंदगी भारी लगे तो नबी ﷺ के सिखाए हुए कलिमों के साथ अल्लाह की ओर लौटें।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"चिंता, कष्ट, डर, ग़ुस्से और क़र्ज़ की दुआएँ" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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