इस्तिग़फ़ार: माफ़ी माँगना और तौबा

7 अज़कार

प्रगति

तौबा और माफ़ी माँगना

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قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم: ((وَاللَّهِ إِنِّي لأَسْتَغفِرُ اللَّهَ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ فِي الْيَوْمِ أَكْثَرَ مِنْ سَبْعِينَ مَرَّةٍ)).

(अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: ‘अल्लाह की क़सम! मैं एक दिन में सत्तर से ज़्यादा बार अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ और उसकी ओर तौबा करता हूँ।)

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((يَا أَيُّهَا النَّاسُ تُوبُوا إِلَى اللَّهِ فَإِنِّي أَتُوبُ فِي الْيَوْمِ إِلَيْهِ مِائَةَ مَرَّةٍ)).

(उन्होंने यह भी फ़रमाया: ‘ऐ लोगो! तौबा करो! बेशक मैं एक दिन में सौ बार अल्लाह की ओर तौबा करता हूँ।)

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((مَنْ قَالَ أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ الْعَظيمَ الَّذِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ القَيّوُمُ وَأَتُوبُ إِلَيهِ، غَفَرَ اللَّهُ لَهُ وَإِنْ كَانَ فَرَّ مِنَ الزَّحْفِ)).

(उन्होंने यह भी फ़रमाया: ‘जो कोई यह कहे:(मैं उस अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा है, सबको क़ायम रखने वाला और संभालने वाला है, और मैं उसकी ओर तौबा करता हूँ।) अल्लाह उसे माफ़ कर देगा, चाहे वह फ़ौज के बढ़ते समय मैदान से भागने वाला ही क्यों न हो।)

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((أَقْرَبُ مَا يَكُونُ الرَّبُّ مِنَ الْعَبْدِ فِي جَوْفِ اللَّيْلِ الآخِرِ فَإِنِ اسْتَطَعْتَ أَنْ تَكُونَ مِمَّنْ يَذْكُرُ اللَّهَ فِي تِلْكَ السَّاعَةِ فَكُنْ)).

(उन्होंने फ़रमाया: ‘रब अपने बंदे के सबसे क़रीब रात के बीच के हिस्से में होता है, इसलिए अगर तुम उस समय अल्लाह को याद करने वालों में शामिल हो सको तो हो जाओ।)

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((أَقْرَبُ مَا يَكُونُ الْعَبْدُ مِنْ رَبِّهِ وَهُوَ سَاجِدٌ فَأَكثِرُوا الدُّعَاءَ)).

(उन्होंने यह भी फ़रमाया: ‘बंदा अपने रब के सबसे क़रीब सज्दे की हालत में होता है, इसलिए उसमें ख़ूब दुआ किया करो।)

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وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: ((إِنَّهُ لَيُغَانُ عَلَى قَلْبِي وَإِنِّي لأَسْتَغْفِرُ اللَّهَ فِي الْيَوْمِ مِائَةَ مَرَّةٍ)).

(उन्होंने यह भी फ़रमाया: ‘बेशक मेरे दिल पर पर्दा-सा पड़ जाता है और बेशक मैं एक दिन में सौ बार अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ।)(पर्दा-सा पड़ना: यानी ‘ग़फ़लत’ की हालत। नबी ﷺ अपने रब के ज़िक्र में, अल्लाह की निकटता पाने में और अल्लाह के एहसास में हमेशा बढ़ते रहते थे, यहाँ तक कि अगर यह शिद्दत किसी भी तरह कम हो जाती तो उसे गुनाह समझते और तुरंत अल्लाह से माफ़ी माँगने में जुट जाते।)

गुनाह हो जाए तो क्या पढ़ें और क्या करें

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((مَا مِنْ عَبْدٍ يُذنِبُ ذَنْباً فَيُحْسِنُ الطُّهُورَ، ثُمَّ يَقُومُ فَيُصَلِّي رَكْعَتَيْنِ، ثُمَّ يَسْتَغْفِرُ اللَّهَ إِلاَّ غَفَرَ اللَّهُ لَهُ)).

(जो भी बंदा कोई गुनाह कर बैठे, फिर वुज़ू करे, दो रकअत नमाज़ पढ़े और फिर अल्लाह से माफ़ी माँगे, तो अल्लाह उसे माफ़ कर देता है।)

बार-बार अल्लाह की ओर लौटें। ये इस्तिग़फ़ार के कलिमे हैं और यह कि गुनाह के बाद क्या करना चाहिए।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"इस्तिग़फ़ार: माफ़ी माँगना और तौबा" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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