सफ़र की दुआएँ: सवारी, यात्रा और घर वापसी

3 अज़कार

प्रगति

गाड़ी या सवारी पर बैठने की दुआ

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((بِسْمِ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ للَّهِ ﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ، وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾، ((الْحَمْدُ لِلَّهِ، الْحَمْدُ لِلَّهِ، الْحَمْدُ لِلَّهِ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي؛ فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلاَّ أَنْتَ)).

(अल्लाह के नाम से और सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। वह पाक है जिसने इस (सवारी) को हमारे अधीन कर दिया, जबकि हम ख़ुद इसे क़ाबू में करने की सामर्थ्य नहीं रखते थे, और हमें अपने रब ही की ओर लौटना है। सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! तू पाक है, बेशक मैंने अपनी जान पर ज़ुल्म किया, इसलिए मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि यक़ीनन तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।)

सफ़र की दुआ

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اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، ﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾ ((اللَّهُمَّ إِنّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا البِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضَى، اللَّهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالْخَليفَةُ فِي الْأَهْلِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ الْمَنْظَرِ، وَسُوءِ الْمُنْقَلَبِ فِي الْمَالِ وَالْأَهْلِ))، وإذا رَجَعَ قَالَهُنَّ وَزَادَ فِيهِنَّ: ((آيِبُونَ، تائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنَا حَامِدُونَ)).

(अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, वह पाक है जिसने इस (सवारी) को हमारे अधीन कर दिया, जबकि हम ख़ुद इसे क़ाबू में करने की सामर्थ्य नहीं रखते थे, और हमें अपने रब ही की ओर लौटना है। ऐ अल्लाह! हम तुझसे अपने इस सफ़र में नेकी और तक़वा का सवाल करते हैं और ऐसे अमल का सवाल करते हैं जिनसे तू राज़ी हो। ऐ अल्लाह! हमारे इस सफ़र को आसान कर दे और इसकी दूरी को हमारे लिए समेट दे। ऐ अल्लाह! तू ही सफ़र में साथी और घर वालों में ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी, निगहबान) है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ सफ़र की मुश्किलों से, दिलों के बदल जाने और बुरी हालत में पड़ने से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ माल और घर वालों में बुरे अंजाम से।)(बिर्र और तक़वा: दो जामे शब्द, जो अलग-अलग लिए जाएँ तो हर नेक अमल और फ़रमाँबरदारी की ओर इशारा करते हैं, यानी हुक्म दिए गए कामों को करना और मना किए गए कामों से बचना। जब दोनों साथ आएँ तो बिर्र का अर्थ हुक्म दिए गए कामों को करना और तक़वा का अर्थ मना किए गए कामों से बचना है।)(ख़लीफ़ा: वह जो किसी की ग़ैरमौजूदगी या मौत के कारण उसकी जगह ले। ख़लीफ़ा शब्द का सही अर्थ यही है; इसलिए यह मानना ग़लत है कि आदम अलैहिस्सलाम ज़मीन पर अल्लाह के ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि, जैसा कि आम तौर पर अनुवाद किया जाता है) हैं, क्योंकि अल्लाह कभी ग़ैरमौजूद नहीं होता और कभी मरेगा नहीं। यह दुआ इस शब्द के सही अर्थ को साबित करती है और बताती है कि जब हम मर जाते हैं या ग़ैरमौजूद होते हैं तो अल्लाह ही हमारे बाद हमारे पीछे छूटे हुए लोगों की निगहबानी करता है।)(लौटने पर यही दुआ इस इज़ाफ़े के साथ पढ़ी जाती है: (हम लौटने वाले, तौबा करने वाले, इबादत करने वाले और अपने रब की प्रशंसा करने वाले हैं।))

सफ़र से लौटने पर क्या पढ़ें

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((يُكَبِّرُ عَلَى كُلِّ شَرَفٍ ثَلاَثَ تَكْبِيرَاتٍ ثُمَّ يَقُولُ: لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ، وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، آيِبُونَ، تَائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنا حَامِدُونَ، صَدَقَ اللَّهُ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزابَ وَحْدَهُ)).

(इब्ने उमर से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ जब किसी जंग या हज से लौटते तो हर ऊँचाई पर कहते: (अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।) और फिर कहते: (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझीदार नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए सारी प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। हम लौटने वाले, तौबा करने वाले, इबादत करने वाले और अपने रब की प्रशंसा करने वाले हैं। अल्लाह ने अपना वादा सच्चा कर दिखाया, अपने बंदे की मदद की और अकेले ही सारे गिरोहों को हरा दिया।))

रवाना होते समय, सफ़र के दौरान और लौटते समय पढ़ी जाने वाली दुआएँ।

स्रोत: हिस्नुल मुस्लिम (मुसलमान का क़िला)। अरबी पाठ अनुवाद के साथ।

प्रश्न

"सफ़र की दुआएँ: सवारी, यात्रा और घर वापसी" के अज़कार कहाँ से लिए गए हैं?

ये हिस्नुल मुस्लिम से लिए गए हैं, जो क़ुरआन और सहीह सुन्नत के अज़कार और दुआओं का संकलन है।

हर ज़िक्र कितनी बार दोहराना चाहिए?

संख्या हर ज़िक्र के ऊपर दिखाई गई है। जहाँ कोई संख्या न हो वहाँ एक बार पढ़ा जाता है।

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