((الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنِي هَذَا، وَرَزَقَنِيهِ، مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلاَ قُوَّةٍ)).
(सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे यह खिलाया और मेरी किसी ताक़त और शक्ति के बिना मुझे यह रोज़ी दी।)
((الْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً كَثِيراً طَيِّباً مُبَارَكاً فِيهِ، غَيْرَ [مَكْفِيٍّ وَلاَ ] مُوَدَّعٍ، وَلاَ مُسْتَغْنَىً عَنْهُ رَبَّنَا)).
(अल्लाह की बहुत ज़्यादा, पाकीज़ा और बरकत वाली प्रशंसा, ऐसी प्रशंसा जो कभी ख़त्म न हो, जिससे हम कभी विदा न हों और जिसके बिना हमारा गुज़ारा न हो, वही हमारा रब है।)(इस दुआ के अर्थ के बारे में दूसरी राय भी हैं, उनमें से एक यह है: अल्लाह की बहुत ज़्यादा, पाकीज़ा और बरकत वाली प्रशंसा। वही है जो काफ़ी है, खिलाता है और खिलाया नहीं जाता। वही है जिसकी चाहत की जाती है, उसके पास जो कुछ है उसके साथ, और वही है जिसकी ज़रूरत है, वही हमारा रब है।)