नमाज़ की शुरुआत की दुआएँ
((اللَّهُمَّ بَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ، اللَّهُمَّ نَقِّنِي مِنْ خَطَايَايَ كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الْأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ، اللَّهُمَّ اغْسِلْني مِنْ خَطَايَايَ، بِالثَّلْجِ وَالْماءِ وَالْبَرَدِ)).
(ऐ अल्लाह! मेरे और मेरे गुनाहों के बीच इतनी दूरी कर दे जितनी तूने पूरब और पश्चिम के बीच की है, ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से ऐसे पाक कर दे जैसे सफ़ेद कपड़ा मैल से साफ़ किया जाता है, ऐ अल्लाह! मेरे गुनाहों को बर्फ़, पानी और ओलों से धो दे।)
((سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُّكَ، وَلاَ إِلَهَ غَيْرُكَ)).
(ऐ अल्लाह! तू पाक है और मैं तेरी प्रशंसा करता हूँ। तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी शान बुलंद है और तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)
((وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ حَنِيفَاً وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ، إِنَّ صَلاَتِي، وَنُسُكِي، وَمَحْيَايَ، وَمَمَاتِي لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، لاَ شَرِيكَ لَهُ وَبِذَلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ. اللَّهُمَّ أَنْتَ المَلِكُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، أَنْتَ رَبِّي وَأَنَا عَبْدُكَ، ظَلَمْتُ نَفْسِي وَاعْتَرَفْتُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي ذُنُوبي جَمِيعَاً إِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ. وَاهْدِنِي لِأَحْسَنِ الأَخْلاقِ لاَ يَهْدِي لِأَحْسَنِها إِلاَّ أَنْتَ، وَاصْرِفْ عَنِّي سَيِّئَهَا، لاَ يَصْرِفُ عَنِّي سَيِّئَهَا إِلاَّ أَنْتَ، لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ، وَالخَيْرُ كُلُّهُ بِيَـــــــدَيْكَ، وَالشَّـــــرُّ لَيْسَ إِلَيْــــــكَ، أَنَا بِكَ وَإِلَيْكَ، تَبارَكْتَ وَتَعَالَيْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتوبُ إِلَيْكَ)).
(मैंने एकनिष्ठ होकर अपना रुख़ उसकी ओर कर लिया जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और मैं शिर्क करने वालों (अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार ठहराने वालों) में से नहीं हूँ। बेशक मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी, मेरी ज़िंदगी और मेरी मौत अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है, उसका कोई साझीदार नहीं, मुझे इसी का हुक्म दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह! तू बादशाह है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तू मेरा रब है और मैं तेरा बंदा हूँ, मैंने अपनी जान पर ज़ुल्म किया और अपने गुनाह का इक़रार किया, इसलिए मेरे सारे गुनाह माफ़ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं करता। मुझे बेहतरीन अख़लाक़ की ओर रहनुमाई दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई उसकी ओर रहनुमाई नहीं कर सकता, और मुझे बुरे अख़लाक़ से दूर रख, क्योंकि तेरे सिवा कोई मुझे उनसे दूर नहीं रख सकता। मैं हाज़िर हूँ, तेरी पुकार के जवाब में, तेरी ख़िदमत के लिए ख़ुशी से हाज़िर हूँ। सारी भलाई तेरे हाथों में है और बुराई तेरी ओर से नहीं है। मैं तेरी मर्ज़ी से मौजूद हूँ और तेरी ही ओर लौटूँगा। तू बरकत वाला और बुलंद है, मैं तुझसे माफ़ी माँगता हूँ और तेरी ओर तौबा करता हूँ।)(अल्लाह ऐसी ख़ालिस बुराई पैदा नहीं करता जिसमें कोई भलाई, फ़ायदा, हिकमत या रहमत बिल्कुल न हो, और न वह किसी को गुनाह किए बिना सज़ा देता है। कोई चीज़ अपनी पैदाइश के लिहाज़ से एक नज़रिए से देखने पर अच्छी हो सकती है और साथ ही दूसरे नज़रिए से देखने पर बुरी भी। अल्लाह ने शैतान को पैदा किया और उसके ज़रिए अपने बंदों को आज़माता है, इसलिए कुछ लोग शैतान से नफ़रत करते हैं, उससे और उसके रास्ते से लड़ते हैं और उससे और उसके पैरोकारों से दुश्मनी रखते हैं, जबकि कुछ दूसरे शैतान के साथी हैं और उसके नक़्शे-क़दम पर चलते हैं। इस तरह बुराई उसकी मख़लूक़ में उसकी मर्ज़ी और हिकमत से मौजूद है, उसके कामों या पैदा करने के अमल में नहीं।)
((اللَّهُمَّ رَبَّ جِبْرَائِيلَ، وَمِيْكَائِيلَ، وَإِسْرَافِيلَ، فَاطِرَ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ، عَالِمَ الغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَنْتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ. اهْدِنِي لِمَا اخْتُلِفَ فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِكَ إِنَّكَ تَهْدِي مَنْ تَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقيمٍ)).
(ऐ अल्लाह! जिब्रील, मीकाईल और इसराफ़ील (बड़े फ़रिश्तों) के रब, आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, ग़ैब और हाज़िर के जानने वाले! तू अपने बंदों के बीच उन बातों का फ़ैसला करने वाला है जिनमें वे इख़्तिलाफ़ करते रहे। जिन बातों में उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया, उनमें अपनी इजाज़त से मुझे हक़ की राह दिखा, क्योंकि बेशक तू जिसे चाहता है सीधे रास्ते की ओर हिदायत देता है।)
((اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرَاً، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيراً، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيراً، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كَثيراً، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كَثيراً، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كَثيراً، وَسُبْحَانَ اللَّهِ بُكْرَةً وَأَصِيلاً)) ثَلاثاً ((أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ: مِنْ نَفْخِهِ، وَنَفْثِهِ، وَهَمْزِهِ)).
(अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह की बहुत ज़्यादा प्रशंसा है, अल्लाह की बहुत ज़्यादा प्रशंसा है, अल्लाह की बहुत ज़्यादा प्रशंसा है, और मैं सुबह और शाम अल्लाह की पाकी बयान करता हूँ।)(मैं अल्लाह की पनाह माँगता हूँ शैतान से, उसके घमंड, उसकी शायरी और उसके पागलपन से।)
((اللَّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ، أَنْتَ نُورُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ قَيِّمُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ، [وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ رَبُّ السَّمَواتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الْحَمْدُ لَكَ مُلْكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ] [وَلَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ مَلِكُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ] [وَلَكَ الْحَمْدُ] [أَنْتَ الْحَقُّ، وَوَعْدُكَ الْحَقُّ، وَقَوْلُكَ الْحَقُّ، وَلِقاؤُكَ الْحَقُّ، وَالْجَنَّةُ حَقٌّ، وَالنَّارُ حَقٌّ، وَالنَّبِيُّونَ حَقٌّ، وَمحَمَّدٌ صلى الله عليه وسلم حَقٌّ، وَالسّاعَةُ حَقٌّ] [اللَّهُمَّ لَكَ أَسْلَمتُ، وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَإِلَيْكَ أَنَبْتُ، وَبِكَ خاصَمْتُ، وَإِلَيْكَ حاكَمْتُ. فَاغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ] [وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي] [أَنْتَ المُقَدِّمُ، وَأَنْتَ المُؤَخِّرُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ] [أَنْتَ إِلَهِي لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ] [وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللَّهِ])).
(ऐ अल्लाह! तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है, तू आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनमें है उनका नूर है। तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है, तू आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनमें है उनको क़ायम रखने वाला है। तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है, तू आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनमें है उनका रब है। तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है और आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनमें है उनकी बादशाही भी। तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है, तू आसमानों और ज़मीन का बादशाह है और तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है। तू हक़ है, तेरा वादा सच्चा है, तेरी बात सच्ची है, वह दिन जिसमें हम तुझसे मिलेंगे सच्चा है, जन्नत का बाग़ सच्चा है और जहन्नम की आग सच्ची है, नबी सच्चे हैं, मुहम्मद सच्चे हैं और क़ियामत की घड़ी सच्ची है। ऐ अल्लाह! मैंने तेरे आगे सर झुका दिया, तुझ पर भरोसा किया, तुझ पर ईमान लाया, तेरी ओर तौबा के साथ रुजू किया, तेरे [नाम की मदद] से झगड़ा किया और तुझी से फ़ैसला चाहा। इसलिए मेरे वे गुनाह माफ़ कर दे जो पहले हो चुके और जो बाद में होंगे, जो मैंने छिपाए और जो मैंने खुलेआम किए। तू ही अल-मुक़द्दिम (आगे करने वाला) और अल-मुअख़्ख़िर (पीछे करने वाला) है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू मेरा माबूद है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)(अल-मुक़द्दिम और अल-मुअख़्ख़िर का अर्थ: अल्लाह अपनी हिकमत के अनुसार अपनी मख़लूक़ में से जिसे चाहता है आगे बढ़ाता और बरतरी देता है और जिसे चाहता है पीछे रखता है। जैसे इंसान को बाक़ी मख़लूक़ पर, नबियों को बाक़ी इंसानों पर और मुहम्मद को तमाम नबियों और रसूलों पर बरतरी देना, आदि।)
रुकू की दुआएँ
((سُبْحانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ)). ثلاث مرَّاتٍ.
(मेरा रब, जो सबसे अज़ीम है, पाक है।’(तीन बार))
((سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي)).
(ऐ अल्लाह, हमारे रब! तू पाक है और मैं तेरी प्रशंसा करता हूँ। ऐ अल्लाह! मुझे माफ़ कर दे।)
((سُبُّوُحٌ، قُدُّوسٌ، رَبُّ المَلاَئِكَةِ وَالرُّوحِ)).
(वह बहुत पाक और मुक़द्दस है, फ़रिश्तों और रूह (यानी जिब्रील) का रब।)
((اللَّهُمَّ لَكَ رَكَعْتُ، وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، خَشَعَ لَكَ سَمْعِي، وَبَصَرِي، وَمُخِّي، وَعَــــظْمِي، وَعَصَبِي، [وَمَا استَقَلَّتْ بِهِ قَدَمِي])).
(ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रुकू किया, तुझ पर ईमान लाया और तेरे आगे सर झुका दिया। मेरे कान, मेरी आँख, मेरा दिमाग़, मेरी हड्डियाँ, मेरे पट्ठे और जो कुछ मेरे पाँव उठाए हुए हैं, सब तेरे आगे झुके हुए हैं।)
((سُبْحَانَ ذِي الْجَبَرُوتِ، وَالْمَلَكُوتِ، وَالْكِبْرِيَاءِ، وَالْعَظَمَةِ)).
(वह पाक है, जो पूरी क़ुदरत, बादशाही, किबरियाई और अज़मत का मालिक है।)
सज्दे की दुआएँ
((سُبْحَانَ رَبِّيَ الأَعْلَى)) ثلاث مرَّاتٍ.
(मेरा रब, जो सबसे बुलंद है, पाक है।’(तीन बार))
((سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي)).
(ऐ अल्लाह, हमारे रब! तू पाक है और मैं तेरी प्रशंसा करता हूँ। ऐ अल्लाह! मुझे माफ़ कर दे।)
((سُبوحٌ، قُدُّوسٌ، رَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ)).
(वह बहुत पाक और मुक़द्दस है, फ़रिश्तों और रूह (यानी जिब्रील) का रब।)
((اللَّهُمَّ لَكَ سَجَدْتُ وَبِكَ آمَنْتُ، وَلَكَ أَسْلَمْتُ، سَجَدَ وَجْهِيَ لِلَّذِي خَلَقَهُ، وَصَوَّرَهُ، وَشَقَّ سَمْعَهُ وَبَصَرَهُ، تَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسنُ الْخَالِقينَ)).
(ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए सज्दा किया, तुझ पर ईमान लाया और तेरे आगे सर झुका दिया। मेरे चेहरे ने उसे सज्दा किया जिसने उसे पैदा किया, उसे सँवारा और उसमें सुनने और देखने की क्षमताएँ निकालीं। अल्लाह बड़ा बरकत वाला है, जो सबसे बेहतरीन पैदा करने वाला है।)
((سُبْحَانَ ذِي الْجَبَرُوتِ، وَالْمَلَكُوتِ، وَالْكِبْرِيَاءِ، وَالْعَظَمَةِ)).
(वह पाक है, जो पूरी क़ुदरत, बादशाही, किबरियाई और अज़मत का मालिक है।)
((اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ: دِقَّهُ وَجِلَّهُ، وَأَوَّلَهُ وَآخِرَهُ، وَعَلاَنِيَّتَهُ وَسِرَّهُ)).
(ऐ अल्लाह! मेरे सारे गुनाह माफ़ कर दे, छोटे भी और बड़े भी, पहले वाले भी और बाद वाले भी, खुले भी और छिपे भी।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقوبَتِكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْكَ، لاَ أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तेरी रज़ा की पनाह माँगता हूँ तेरी नाराज़गी से और तेरी माफ़ी की पनाह माँगता हूँ तेरे अज़ाब से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ तुझसे। मैं तेरी प्रशंसा की गिनती नहीं कर सकता, तू वैसा ही है जैसी तूने ख़ुद अपनी प्रशंसा की है।)
आख़िरी तशह्हुद के बाद और नमाज़ ख़त्म करने से पहले की दुआएँ
((اللَّهُــمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ क़ब्र के अज़ाब से, जहन्नम की आग के अज़ाब से, ज़िंदगी और मौत के फ़ितनों से और अल-मसीह अद-दज्जाल के बुरे फ़ितने से।)(अल-मसीह अद-दज्जाल: क़ियामत की बड़ी निशानियों में से और इंसानियत पर आने वाले सबसे बड़े फ़ितनों में से एक, जिससे हर नबी ने ख़बरदार किया है। अधिकतर लोग उसकी पैरवी करेंगे। वह ईरान के असबहान से उस समय निकलेगा जब मुसलमान क़ुस्तुंतुनिया को फ़तह करेंगे। उसे ख़ास ताक़तें दी जाएँगी और वह हक़ को बातिल और बातिल को हक़ दिखाएगा। वह पहले नेक होने का दावा करेगा, फिर नबी होने का और अंत में ख़ुदा होने का। उसकी निशानियों में से यह है कि वह दाईं आँख से काना होगा, जो उसके अल्लाह होने के दावे के झूठ होने का पक्का सबूत है क्योंकि यह कमी की निशानी है। उसकी दोनों आँखों के बीच “काफ़िर” लिखा होगा जिसे हर मोमिन, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, पहचान लेगा।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَأَعوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ، وَأَعوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ. اللَّهُمَّ إِنِّي أَعوذُ بِكَ مِنَ الْمَأْثَمِ وَالْمَغْرَمِ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ क़ब्र के अज़ाब से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ अल-मसीह अद-दज्जाल के फ़ितने और आज़माइश से, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ ज़िंदगी और मौत के फ़ितनों से। ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ गुनाह और क़र्ज़ से।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي ظُلْماً كَثِيراً، وَلاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِي مَغْفِرَةً مِنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِي، إِنَّكَ أَنْتَ الغَفورُ الرَّحيمُ)).
(ऐ अल्लाह! मैंने अपनी जान पर बहुत ज़ुल्म किया है और तेरे सिवा गुनाहों को कोई माफ़ नहीं कर सकता, इसलिए तू अपनी ओर से मुझे माफ़ कर दे और मुझ पर रहम फ़रमा। बेशक तू ही बहुत माफ़ करने वाला, बड़ा मेहरबान है।)(अपनी ओर से: यानी अपने ख़ास फ़ज़ल से, बिना किसी हक़ के, ऐसी माफ़ी जो तेरी अज़ीम दरियादिली के लायक़ हो।)
((اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي مَا قَدَّمْتُ، وَمَا أَخَّرْتُ، وَمَا أَسْرَرْتُ، وَمَا أَعْلَنْتُ، وَمَا أَسْرَفْتُ، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي. أَنْتَ الْمُقَدِّمُ، وَأَنْتَ الْمُؤَخِّرُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ)).
(ऐ अल्लाह! मेरे वे गुनाह माफ़ कर दे जो मैं पहले कर चुका और जो बाद में करूँगा, जो मैंने छिपाकर किए और जो खुलेआम किए, और जहाँ मैंने हद से ज़्यादती की, और वे सब जिन्हें तू मुझसे ज़्यादा जानता है। तू ही अल-मुक़द्दिम (आगे करने वाला) और अल-मुअख़्ख़िर (पीछे करने वाला) है। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।)(अल-मुक़द्दिम और अल-मुअख़्ख़िर का अर्थ: अल्लाह अपनी हिकमत के अनुसार अपनी मख़लूक़ में से जिसे चाहता है आगे बढ़ाता और बरतरी देता है और जिसे चाहता है पीछे रखता है। जैसे इंसान को बाक़ी मख़लूक़ पर, नबियों को बाक़ी इंसानों पर और मुहम्मद को तमाम नबियों और रसूलों पर बरतरी देना, आदि।)
((اللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ، وَشُكْرِكَ، وَحُسْنِ عِبادَتِكَ)).
(ऐ अल्लाह! मुझे अपना ज़िक्र करने, अपना शुक्र अदा करने और बेहतरीन तरीक़े से अपनी इबादत करने की तौफ़ीक़ दे।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْبُخْلِ، وَأَعوذُ بِكَ مِنَ الْجُبْنِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ أُرَدَّ إِلَى أَرْذَلِ الْعُمُرِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الدُّنْيَا وَعَذَابِ الْقَبْرِ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ कंजूसी और बुज़दिली से, मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इससे कि मुझे सबसे बुरी उम्र की ओर लौटाया जाए “यानी बुढ़ापा, कमज़ोरी, लाचारी और डर की हालत”, और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इस दुनिया के फ़ितनों और क़ब्र के अज़ाब से।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत का सवाल करता हूँ और जहन्नम की आग से तेरी पनाह माँगता हूँ।)
((اللَّهُمَّ بِعِلْمِكَ الغَيْبَ وَقُدْرَتِكَ عَلَى الْخَلقِ أَحْيِنِي مَا عَلِمْتَ الْحَيَاةَ خَيْراً لِي، وَتَوَفَّنِي إِذَا عَلِمْتَ الْوَفَاةَ خَيْراً لِي، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَشْيَتَكَ فِي الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، وَأَسْأَلُكَ كَلِمَةَ الْحَقِّ فِي الرِّضَا وَالْغَضَبِ، وَأَسْأَلُكَ الْقَصْدَ فِي الْغِنَى وَالْفَقْرِ، وَأَسْأَلُكَ نَعِيماً لاَ يَنْفَدُ، وَأَسْأَلُكَ قُرَّةَ عَيْنٍ لاَ تَنْقَطِعُ، وَأَسْأَلُكَ الرِّضَا بَعْدَ الْقَضَاءِ، وَأَسْــــأَلُكَ بَرْدَ الْعَيْشِ بَعْدَ الْمَوْتِ، وَأَسْأَلُكَ لَذَّةَ النَّظَرِ إِلَى وَجْهِكَ، وَالشَّوْقَ إِلَى لِقائِكَ فِي غَيرِ ضَرَّاءَ مُضِرَّةٍ، وَلاَ فِتْنَةٍ مُضِلَّةٍ، اللَّهُمَّ زَيِّنَا بِزِينَةِ الإِيمَانِ، وَاجْعَلْنَا هُدَاةً مُهْتَدِينَ)).
(ऐ अल्लाह! ग़ैब के इल्म और मख़लूक़ पर अपनी क़ुदरत के वास्ते से, मुझे उस वक़्त तक ज़िंदा रख जब तक तू जानता है कि ज़िंदगी मेरे लिए बेहतर है और मुझे उठा ले जब तू जानता हो कि मौत मेरे लिए बेहतर है। ऐ अल्लाह! मुझे छिपे और खुले में अपना डर नसीब कर और मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि ख़ुशी और ग़ुस्से में मुझे सच बोलने वाला बना।मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि मुझे मालदारी और तंगदस्ती में संतुलित रख और मैं तुझसे ऐसी नेमत और ठंडक का सवाल करता हूँ जो कभी ख़त्म न हो।मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तेरे फ़ैसले पर मुझे राज़ी रख और मौत के बाद की आसान ज़िंदगी दे।मैं तुझसे तेरे चेहरे के दीदार की मिठास और तुझसे मिलने के शौक़ का सवाल करता हूँ, ऐसे तौर पर कि न कोई नुक़सान पहुँचाने वाली मुसीबत आए और न गुमराह करने वाला फ़ितना। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की ज़ीनत से सजा दे और हमें हिदायत देने वाले और हिदायत पाने वाले बना दे।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ يَا أَللَّهُ بِأَنَّكَ الْوَاحِدُ الْأَحَدُ الصَّمَدُ الَّذِي لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يولَدْ، وَلَمْ يَكنْ لَهُ كُفُواً أَحَدٌ، أَنْ تَغْفِرَ لِي ذُنُوبِي إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُورُ الرَّحِّيمُ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूँ, ऐ अल्लाह, इस वास्ते से कि तू एक है, अकेला है, अस-समद है, जिसने न किसी को जना और न वह जना गया और कोई उसके बराबर नहीं, कि तू मेरे गुनाह माफ़ कर दे, क्योंकि तू ही बहुत माफ़ करने वाला, बड़ा मेहरबान है।)(अस-समद: बेनियाज़ मालिक, कमाल की सिफ़ात वाला, जिसकी ओर सारी मख़लूक़ अपनी हर ज़रूरत में रुजू करती है।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّ لَكَ الْحَمْدَ لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، الْمَنَّانُ، يَا بَدِيعَ السَّمَوَاتِ وَالْأَرْضِ يَا ذَا الْجَلاَلِ وَالْإِكْرَامِ، يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ)).
(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूँ, इस वास्ते से कि तेरे ही लिए सारी प्रशंसा है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई साझीदार नहीं। तू बड़ा एहसान करने वाला है। ऐ आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, ऐ अज़मत और इकराम वाले, ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले, ऐ सबको क़ायम रखने वाले और संभालने वाले! बेशक मैं तुझसे जन्नत का सवाल करता हूँ और जहन्नम की आग से तेरी पनाह माँगता हूँ।)
((اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّي أَشْهَدُ أَنَّكَ أَنْتَ اللَّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ الْأَحَدُ الصَّمَدُ الَّذِي لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُواً أَحَدٌ)) .
(ऐ अल्लाह! मैं तुझसे सवाल करता हूँ, इस वास्ते से कि मैं गवाही देता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू एक है, अस-समद है, जिसने न किसी को जना और न वह जना गया और कोई उसके बराबर नहीं।)(अस-समद: बेनियाज़ मालिक, कमाल की सिफ़ात वाला, जिसकी ओर सारी मख़लूक़ अपनी हर ज़रूरत में रुजू करती है।)